अलंकार की परिभाषा | भेद |उदहारण || हिंदी व्याकरण

अलंकार की परिभाषा :-

अलंकार:- अलंकार दो शब्दों से मिलकर वना होता है अलम + कार  से अलम का अर्थ होता है आभूषण और कार का अर्थ होता है करने वाला 

 अलंकार का शाब्दिक अर्थ है सजावट, आभूषण, श्रगार,  जिस तरह स्त्री की शोभा उसकी गहने और आभूषण से होती  है और इसी प्रकार काव्य की शोभा अलंकार से होती है। उसे अलंकार कहते  है।

अलंकार कितने  प्रकार का होता है ?

अलंकार तीन प्रकार के होते है।

  1. शब्दालंकार
  2. अर्थालंकार
  3. उभयालंकार

शब्दाअलंकार किसे कहते हैं?

जहाँ शब्दों के प्रयोग से  जो काव्य में चमत्कार उत्पन्न होता है । अर्थात जब शब्दों के बदलने पर चमत्कार कम हो जाता है। वहाँ  शब्दों  अलंकार होता  है।

शब्दाअलंकार  पांच प्रकार का  होता है ?

  1. अनुप्रास अलंकार
  2. यमक अलंकार
  3. श्लेष अलंकार
  4. वक्रोक्ति अलंकार
  5. वीप्सा अलंकार

 (1) अनुप्रास अलंकार किसे कहते हैं ?

अनुप्रास  दो शब्दों से (अनु + प्रास ) के योग से वना है  अनु का अर्थ  होता है बार -बार  और प्रास का अर्थ  वर्ण या अक्षर अर्थात जहाँ एक ही वर्ण या अक्षर  की बार बार आवृति हो वहाँ  हैं अनुप्रास अलंकार कहते है ।

उदाहरण:-

  1. वामन में बागन में बगरयो सन्त है।
  2. धुर धुर मुस्कान नोहर ,नुज वेश का उजियाला।
  3. कालिंदी कूल कदम्ब की डरनी।
  4. कंकण किंकिण नुपुर धुनी सुनी। 
  5. चारु चन्द्र की चंचल किरणें खेल रही थी जल थल में।(च शब्द की बार बार आवृति हो हो रही है )
  6.   बिरति विवेक विनय विज्ञाना। बोध जयारथ वेद पुराना।।
  7. कंकन किंकन नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन राम हृदय मुनि।।(क और न शब्द की बार बार आवृति हो हो रही है )

अनुप्रास अलंकार प्रकार  पाँच  होते हैं

  1. छेकानुप्रास 
  2. वृत्यानप्रास
  3. लाटानुप्रास 
  4. अन्त्यानुप्रास
  5. श्रृत्यानुप्रास
छेकानुप्रास अलंकार:-

जब कोई वर्ण स्वरूप के अनुसार और क्रम के अनुसार दो बाद आता है अर्थात् छेकानुप्रास को छेक अनुप्रास के नाम से भी जाना जाता है। जिसमें ‘छेक’ का अर्थ होता है चतुर अथवा चालाक तो वहाँ पर छेक अनुप्रास होता है।

उदाहरण:- 

  • बन्दउँ गुरू पद पदुम परागा। सुरूचि सुबास सरस अनुरागा।। पहचान –  प’ के बाद ‘द’ और फिर पदुम में ‘प’ के बाद ‘द’ स्वरूपतः एव क्रमतः आया है।
  • राधा के वर वैन सुनि, चीती चकित सुभाय । दाख दुखी मिसरी मुरी, सुधा रही सकुचाय ।।पहचान दाख’ और ‘दुखी’ में वर्ण स्वरूपानुसार एवं क्रमानुसार आये हैं।
  • दाख’ और ‘दुखी’ में वर्ण स्वरूपानुसार एवं क्रमानुसार आये हैं। पहचान – रीझि रीडझि, रहसि रहसि, हसि हसि, दई दई में
वृत्यानुप्रास अलंकार:-

जब किसी पंक्ति में एक अक्षर  की एक से अधिक बार आवृत्ति हो अर्थात  जहाँ एक या अलग अलग वर्णों की असमान क्रम में आवृति हो तो वहाँ वृत्यानुप्रास होता है।

उदाहरण:-

 

  • चारू चन्लद्नर की चंचल किरणे खेल रही रही थी जल थल में || च तीन बार ,ल चार बार 
  • केलिन में कछारन में कुंजन में |क्यारिन में कलित किलंकत है|| पहचान – क के बाद ‘ल चार बार आ गया है
  • रघु नंद आनंद कंद कोशल चंद दशरथ नंदनम्न के बाद द कई बार आया है पहचान – न के बाद द कई बार आया है
लाटानुप्रास अलंकार:-

जब किसी शब्द अथवा वाक्य की आव्रती  एक ही तरह हो लेकिन उस के अन्वय करने से अथात कहने अथवा लिखने में थोड़ा सा अन्तर हो जाय तो वहाँ लाटानुप्रास होता है।

उदाहरण:-

  • पूत सपूत तो का धन संचय ? पूत कपूत तो का धन संचय? पहचान –  पुत्र अगर अच्छा है तो घन इकट्ठा करने की कोई जरूरत  नहीं है क्योंकि वह धन इकट्ठा कर लेगा, और अगर पुत्र वुरा  है तो धन इकट्ठा करने की कोई  जरूरत   नहीं है क्योंकि वह इकट्ठा किये हुए धन को नष्ट  कर देगा।
  • माँगी नाम न केवट आना| मागी नाव न, केवट आना || पहचान – पहली पंक्ति का अर्थ है नाव मांगते हैं लेकिन केवट नहीं आता है और दूसरी पंक्ति का अर्थ है कि नाव मांगते नहीं है फिर भी केवट आता है
अन्त्यानुप्रास अलंकार:-

जिस पंक्ति के अंत तुक मिलती हो  उसे अन्त्यानुप्रास कहते हैं। अन्त्यानुप्रास को तुकान्त अलंकार भी कहते हैं।

उदाहरण:-

  • मेरे मन के मीत मनोहर |  तुम हो प्रियवर मेरे सहचर।।
  • जय हनुमान ज्ञान गुण सागर जय कपीस  तीनो लोक उजागर|| 
  • रंगराती रातै हिये, प्रियतम लिखी बनाई।  पाती काती रिह की, छाती रही लगाई। ।
  • जितने गुण सागर नागर हैं। कहते यह बात उजागर हैं।।
श्रुत्यानुप्रास अलंकार :-

जब एक ही वर्ग के वर्णों की आवर्ती हो अर्थात जो सुनने में अच्छा लगे या जिस पंक्ति में ऐसे वर्णों का प्रयोग अधिक हो जिनका उच्चारण स्थान एक हो तो वहाँ श्रुत्यानुप्रास अलंकार होता है।

उदाहरण:-

  • दबकि दबोरे एक बार्दिघ में बोरे एक | मगन मही में एक नगन जड़ात है।|
  • चरर मरर ख ल गये अरर रवस्फूटों से।
यमक अलंकार परिभाषा एवं उदाहरण

यमक शब्द का अर्थ होता है दो या जोड़ा अर्थात जहाँ कोई शब्द एक से अधिक बार आये और उसका अर्थ अलग अलग हो वहाँ   यमक अलंकार होता है । 

उदाहरण:-

  • सजना है मुझे सजना के लिए 
  • कनक कनक ते सौगुनी मादकता अधिकाय। या खाए बौरात नर या पा बौराय।। कनक’ शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है  पहले  का अर्थ  सोना’ और दुसरे का अर्थ धतूरा’
  • काली घटा का घमंड घटा।| घटा शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है  पहले  का अर्थ 
  • तीन बेर खाती है वह तीन बेर खाती है। 
  • माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
    कर का मनका डारि दै, मन का मनका फेर।।
श्लेष अलंकार परिभाषा एवं उदाहरण:-

श्लेष का अर्थ है चिपका हुआ या मिला हुआ। कोई शब्द एक ही बार आया है लेकिन उसका एक से अधिक अर्थ देता है  उसे  श्लेष अलंकार  कहते है।अर्थात्  किसी शब्द का प्रयोग एक बार ही हुआ हो लेकिन उससे अर्थ कई निकलते हैं तो वह श्लेष अलंकार कहलाता है। उदहारण :-

  • चरन धरत चिंता करत चित वत चारहुँ ओर   सुवरन को खोजत फिरत ||कवि व्यभिचारी चोर। सुवरन के तीन अर्थ होते है पहला सोना दूसरा सुन्दर स्त्री और तीसरा अच्छा अक्षर से  
  • रहिमन पानी राखिये,बिन पानी सब सून पानी गये न ऊबरै, मोती मानुष चून।। पानी का पहला अर्थ मनुष्य विनम्रता से है दूसरे क अर्थ तेज या चमक से है तीसरे का अर्थ जल से है 
  • जे रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय । बारे उजियारो करै, बढ़े अंघेरो होय।
  • रावण सर सरोज बनचारी। चलि रघुवीर सिलीमुख। सिलीमुख  शब्द के दो अर्थ  हैं।  पहले का अर्थ बाण से है और  दूसरे का अर्थ भ्रमर से है।
विवीप्सा अलंकार:-

जब आदर ,हर्ष शोक भावो को प्रभावशाली ढग से व्यक्त करने के लिए शब्दों की पुनरावर्ति की जाती है तो उसे विवीप्सा अलंकार कहते है  वीप्साअलंकार को पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार के नाम से ही जाना जाता है 

उदहारण :-

  • मोहि -मोहि मोहन को मन भये राधामय 
  • सूरज है जग का बुझा -बुझा |
  • धरती ने किलाये है ज्वलंत लाल – लाल 
वक्रोक्ति अलंकार :-

जहाँ किसी कथन या बात या घटना विषय के बारे में सीधे सीधे ना कहकर घुमा फिराकर कहा जाये वहाँ वक्रोक्ति अलंकार कहते है 

उदहारण :-

  • को तुम ? घनश्याम होम तो बरसो किट जाय |
  • सरदार पटेल  को भारत का लोह पुरुष कहा जाता है 
  • महाराणा प्रताप मेवाड के शेर थे 
  • गरीवो की रोटी मत खीचो  
अर्था अलंकार किसे कहते हैं? 

जब काव्य में अर्थ के व्दारा चमत्कार उत्पन्न हो उसे अर्था अलंकार कहते  है।

अर्थालंकार चार प्रकार के होते है ?

  1. उपमा अलंकार
  2. रूपक अलंकार
  3. उत्प्रेक्षा अलंकार
  4. अतिशयोक्ति अलंकार

उपमा अलंकार(तुलना ):-  उपमा अलंकार दो शब्दों (उप +मा)से मिलकर वना है जिसमे उप का अर्थ है समीप तथा मा का अर्थ है मापना या तुलना करना अतः उपमा का अर्थ है दो वस्तुओ या व्यक्तियों को समीप रख कर  तुलना करना  परिभाषा :- जब किसी व्यक्ति या वस्तु की तुलना की दुसरे व्यक्ति या वस्तु से की जाती है या  जब उपमेय की तुलना उपमान से की जाती है उसे  उपमा अलंकार होता है।

उपमा अलंकार के चार अंग होते है |

  1. उपमेय
  2. उपमान
  3. समता वाचक शब्द
  4. अर्थ
  • उपमेय:-  जिसकी तुलना की जाए जो बाद में प्उरसिद्सेध हो  उपमेय कहते है 
  • उपमान:- जिससे तुलना की जाए उसे उपमान कहते है 
  •  वाचक शब्द:- उपमेय और उपमान में समानता या तुलना प्रकट करने के लिए जिन शब्दों का प्रयोग किया जाता है उसे वाचक शब्द कहते है जैसे :- सा, सी, से ,सो, सरिस, सम ,तुल्य ,जैसा ,जैसी, के समान, आदि।
  • साधारण धर्म:-जो गुण या धर्म दोनों में मौजूद हो 
रूपक अलंकार :-

जहां पर उपमेय और उपमान में कोई अंतर ना दिखाई दे वहाँ रूपक अलंकर होता है अर्थात् जहाँ उपमेय में ही उपमान का अभेद आरोप या निषेध रहित अरोप कर दिया गया हो वहाँ रूपल अलंकर है 

उदहारण :-

  • वन शारदी चन्द्रिका-चादर ओढ़े। (उपमेय -‘चन्द्रिका’ है और उपमान  ‘चादर’ है )
  • पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। (उपमेय  ‘राम रतन’  है  उपमान – धन’ है )
  • उदित उदयगिरि -मंच पर रघुवर बाल पतंग। विकसे संत-सरोज सब हरषे लोचन-भृंग।।
  • अम्बर -पनघट में डुबो रही तारा-घट उषा नागरी।
  • संतो भाई आई ग्यान की आंधी 

उत्प्रेक्षा अलंकार:- जब समानता होने के कारण उपमेय में उपमान के होने कि  संभावना हो उसे  उत्प्रेक्षा अलंकार कहते है पहचान :- मनु, जनु, जनहु, जानो, मानहु मानो, निश्चय, ईव, ज्यों आदि 

उदहारण :-

  • उस काल मरे क्रोध के तन काँपने उसका लगा मानो हवा की जो से सोता हुआ सागर जगा 
  • सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात | मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतप परयौ प्रभात ||
  • सखि सोहत गोपाल के, उर गुंजन की मालबाहर सोहत मनु पिये, दावानल की ज्वाल।।
  • रहिमन पुतरी श्याम की मनहु जलज मधुकर लसै 

अतिशयोक्ति अलंकार:- जहां किसी व्यक्ति या वस्तु के बारे  बहुत बड़ा चढ़ाकर बताया जाये उसे अतिशयोक्ति अलंकार कहते हैं।

उदहारण :-

  • हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग, लंका सगरी जल गयी गए निशाचर भाग । 
  • देख लो साकेत नगरी है यही | स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही। 
  • आगे नदियां पड़ी अपार घोडा कैसे उतरे उस पार। राणा ने सोचा इस पार जब तक चेतक था उस पार।।
  • परवल पाक, फाट हिय गोहूँ।
  • मैं बरजी कैबार तू, इतकत लेती करौंट। पंखुरी लगे गुलाब की, परि है गात खरौंट। 

विरोधाभास अलंकार किसे कहते हैं?

जहां वास्तव में विरोध ना केवल विरोध का आभास हो विरोधाभास अलंकार कहते हैं। वाक्य या कथन या पंक्ति निषेधात्मक शब्द (ना नी ने नहीं मना आदि का प्रयो किया जाता है 

उदहारण :-

  • जब  से है आँख लगी तब से ना आँख लगी 
  • ना खुदा मिला ना विसाले सनम 
  • वह सुनना जब ते मधुर तब ते सूरत ना बैन।

भ्रांतिमान अलंकार किसे कहते हैं?

जहाँ उपमेय व उपमान के वीच भ्ऐरान्सेति ,भ्रम उपस्थित हो जाये लिकिन कुछ क्षण या पल के बाद भ्रान्ति समाप्त हो जाये तो उसे भ्रांतिमान अलंकार कहलाता है।

उदाहरण:-

  • नाक का मोती अधर की कांति से  वीज दाडीम का समझकर भ्रान्ति से देखना ही रह गया शुंक मोन
  • जानि श्याम घनश्याम को नाचि उढे वन मोर  

संदेह अलंकार क्या है?

जहाँ किसी वस्तु या व्यक्ति को देखकर संशय वना रहे अर्थात निश्चय ना हो सके वहाँ  संदेह अलंकार होता है जब किसी कथन को पढ़कर भी संशय बना रहे तो उसे संदेह अलंकार कहेंगे।

उदाहरण:-

  • सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है। सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है
  • यह मुख है या चन्द्र है 
  • यह काया है या शेष इसी की छाया है 

मानवीकरण अलंकर :- 

जहाँ जड़ पदार्थो में चेतक की अनुभूति हो जहाँ निर्जीव वस्तुओ सजीवता का वर्णन हो अर्थात जहाँ मनुष्य का प्रक्रति के साथ सम्वन्ध जोड़ा जाये उसे मानवीकरण अलंकर कहते है 

उदाहरण:-

  • अँखियाँ हरि दर्शन की भूखी 
  • सुनो ए संगमरर की दीवारे आगे नही कुछ भी तुम्हारे  
 

 

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