भारतीय संविधान संशोधन

भारतीय संविधान संशोधन

भारतीय संविधान का निर्माण एक सतत प्रक्रिया है क्योकि संविधान संशोधन संविधान का अभित्र अंग है |संविधान के भाग 20 (अनु .- 368 ) में संसद को  संविधान में  संशोधन की शक्ति दी  गयी है | संसद द्वारा अब तक किये गये संशोधनों का संक्षिप्त विवरण निम्न है 

प्रथम संविधान संशोधन  1951 

    इस संशोधन को रोमेश थापर बनाम स्टेट ऑफ़ मद्रास (1951) एस.सी . के मामलो में उच्चतम न्यायालय के विनिच्क्षय से उत्पन्न कठिनाइयो को दूर करने के लिए पारित किया गया था |  

  • इसके द्वारा स्वतंत्रता ,समानता एवं सम्पति से सम्बन्धित मूल अधिकारों को लागू किए जाने सम्बन्धी कुछ व्यावहारिक कठिनाइयो को दूर करने का प्रयास किया गया |वाक्र एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूल अधिकार पर इसमे उचित प्रतिबन्ध की व्यवस्था की गई |
  • इसके लिए अनु.19 के खण्ड (2) में निर्बन्धन के तीन नये आधार ”लोक -व्यवस्था ‘ ‘विदेशी राज्य से मैत्री सम्बन्ध ‘और अपराध करने के लिए उत्प्रेरित करना ‘ जोड़े गये |
  • भूमि विधियों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने के उदेश्य से इस संशोधन द्वारा संविधान के अंतर्गत 9वीं अनुसूची को जोड़ा गया है |इसमे उल्लिखित कानूनों की सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्तियों के अंतर्गत परीक्षा नही की जा सकती है |इसके लिए अनु. (अ)और 31 (ब) जोड़ा गया है |

2 वाँ  संविधान संशोधन  1952      

    इसके द्वारा 1951 की जनगणना के आधार पर संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व को पुनः निर्धारित किया गया |

3 वाँ  संविधान संशोधन 1954   

इस संशोधन के द्वारा समवर्ती सूचि की 33 वी प्रविष्टि में संशोधन किया गया और इसमे खाधान्न ,पशुओ के लिए चारा और कच्चा कपास आदि विषयों को रखा गया |   

4 वाँ  संविधान संशोधन 1955

   इस संशोधन को बेला बनर्जी, के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय से उत्पन्न कठिनाई को दूर करने के लिए पास किया गया था, इसके अंतर्गत व्यक्तिगत सम्पति को लोकहित में राज्य द्वारा हस्तगत किए जाने की स्थिति में ,न्यायालय इसकी क्षतिपूर्ति के सम्बन्ध में परीक्षा नही कर सकती |

5 वाँ  संविधान संशोधन 1955

  इसके द्वारा अनुच्छेद -3 में संशोधन कर राज्य पुनर्गठन से संबंधित विधेयकों पर राज्यों द्वारा अनुसमर्थन करने की अवधि नियत करने की शक्ति राष्ट्रपति को दी गयी |यदि निर्धारित अवधि के भीतर राज्य अपनी राय व्यक्त नही करते तो विधेयक को संसद द्वारा पारित मान लिए जाने का प्रावधान किया गया |   

6 वाँ  संविधान संशोधन 1956

इस संशोधन और संविधान की सातवीं अनुसूची के संघ सूचि में प्रविष्टि -92 (क) जोडकर केंद्र सरकार को अन्तर्राज्यीय क्रय -विक्रय पर कर लगाने की शक्ति प्रदान की गयी |इसके लिए अनु .269 में 286 में कुछ परिवर्तन किये गये  

7 वाँ संविधान संशोधन 1955

 यह संशोधन राज्यपुनर्गठन अधिनियम ,1955 ‘ को कार्यान्वित करने के लिए पारित किया गया |इसके द्वारा राज्यों का पुनर्गठन 14 राज्यों तथा 6 संघ शासित क्षेत्रों में किया गया | साथ ही ,इनके अनुरूप केंद्र एवं राज्य की विधानपलिकाओ में सीटों को  पुनर्व्यवस्थित  किया गया |  

अनु .230 , 331 में संशोधन करके उच्च न्यायालयों  के क्षेत्रधिकार को संघ राज्य क्षेत्रों पर बढ़ा दिया गया और दो से अधिक राज्यों के लिए एक उच्च न्यायालय कर उपबन्ध किया गया

8 वाँ संविधान संशोधन 1960 

इसके द्वारा अनु. 334 में संशोधन कर विधानमंडलो में अनुसूचित जातियों ,अनुसूचित जनजातियों और एंग्लो -इंडियन के लिए स्थानों के आरक्षण की अवधि को 10 वर्ष से 20 वर्ष तक अर्थात् 1970 तक कर दिया गया |

9 वाँ संविधान संशोधन 1960

यह संशोधन उच्चम न्यायालय द्वारा बेरुबारी के मामले में दिये परामर्श को लागू करने के लिए पारित किया गया था |उक्त मामलें में न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था की भारत भूमि को किसी विदेशी राज्य के अध्यर्पण के लिए  संविधान में संशोधन करना आवश्यक है ;अन्तः प्रथम अनुसूची में आवश्यक परिवर्तन करने बेरुबारी ,खुलना आदि क्षेत्रों को पाकिस्तान को दे दिया गया |

10 वाँ संविधान संशोधन 1961 

इसके द्वारा भुतपूर्व पुर्तगाली क्षेत्रों दादर एवं नगर  हवेली को भारत में  शामिल कर उन्हें केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा प्रदान किया गया |इसके तहत इस केंद्रशासित प्रदेश में राष्ट्रपति के विनिमय बनाने की शक्तियों तथा उसमें प्रशासन की व्यवस्था करने के लिए अनु. 240 और पहली अनुसूची को संशोधित किया गया | 

11 वाँ संविधान संशोधन 1961

   इस संशोधन द्वारा संविधान के अनु. 71 में खण्ड 4 जोड़कर यह उपबन्धित किया गया कि निर्वाचन मंडल में रिक्तता के आधार पर राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की वैधता को चुनोती नहीं दी जा सकती |इस संशोधन     को डॉ. खरे के मामले के पश्चात् पारित किया गया था |

12 वाँ संविधान संशोधन 1962

इसके द्वारा संविधान की प्रथम अनुसूची में संशोधन कर गोवा दमन एवं दिव को  भारत में संघ शासित प्रदेश के रूप में शामिल किया गया | 

13 वाँ संविधान संशोधन 1962 

इसके द्वारा संविधान में 371 ए जोड़ा गया तथा नागालैण्ड के सम्बन्ध में विशेष प्रावधान कर उसे एक राज्य का दर्जा दे दिया गया |

14 वाँ संविधान संशोधन 1963

 इसके द्वारा केन्द्रशासित प्रदेश के रूप में पांडिचेरी को संविधान के प्रथम अनुसूची में शामिल किया गया तथा अनु. 239क जोड़कर संघ शासित प्रदेशों में विधान मण्डल और मंत्रिपरिषद् बनाने का संसद को अधिकार दिया गया |

15 वाँ संविधान संशोधन 1963

       इस संशोधन को न्यायधीश मित्तल के मामले से उत्पन्न समस्या के निराकरण के लिए पारित किया गया था |इसके द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की सेवा निव्रत्ती की आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दी गई तथा     एक नया अनु.224 क जोड़कर उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायधिशो को उच्च न्यायालय में नियुक्ति से सम्बन्धित प्रावधान किये गए |इसके द्वारा अनु. 226 में एक नया खण्ड (1- क )जोड़ा गया इसके अधीन उच्च   न्यायालय किसी सरकार , प्रधिकारी या व्यक्ति के विरुध्द निदेश या रिट जरी कर सकता है , भले ही ऐसे व्यक्ति उसके क्षेत्राधिकार में न हों |

16 वाँ संविधान संशोधन 1963 

  इसके द्वारा अनु. 19 खण्ड 2,3,4,में भारत की प्रभूता और अखण्डता के हित में शब्दों को जोड़कर राज्य को अनु.19 द्वारा प्रदत्त मोलिक अधिकार को सिमित करने की शक्ति प्रदान की गयी तथा साथ ही तीसरी अनुसूची में    भी परिवर्तन कर शपथ ग्रहण के अन्त में ‘भारत की प्रभुता एवं अखण्डता को बनाए रखूंगा ‘शब्दों को जोड़ा गया |  

17 वाँ संविधान संशोधन 1964 

  इसके तहत अनु.-31(क)और 9 वीं अनुसूची में संशोधन किया गया |इसका उदेश्य केरल और मर्दास राज्य द्वारा पारित भूमि सुधार अधिनियमों को संविधानिक संरक्षण प्रदान करना था | 

18 वाँ संविधान संशोधन 1966

   इसके द्वारा अनु.-3  में स्पष्टीकरण जोड़कर यह स्पष्ट किया गया कि ‘राज्य ‘शब्द के अंतर्गत संघ राज्य क्षेत्र भी आते है |अन्तः संसद किसी ‘राज्य या संघ राज्य क्षेत्र ‘का गठन कर सकती है |तत्पशचात पंजाब का भाषी आधार   पर पुनर्गठन करते हुए पंजाबी भाषी क्षेत्र को पंजाब एवं हिंदी भाषी क्षेत्र को हरियाणा के रूप में गठित किया गया |पर्वतीय क्षेत्र को हिमाचल प्रदेश का तथा चंडीगढ़ को केन्द्रशासित प्रदेश का दर्जा प्रदान किया गया |

19 वाँ संविधान संशोधन 1966ई.

  इसके तहत अनु.324  में संशोधन करके चुनाव आयोग के अधिकारों म्र परिवर्तन करते हुए निर्वाचन सम्बन्धी न्यायाधिकरण नियुक्त करने की शक्ति का अन्त कर दिया गया तथा संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों के     चुनाव सम्बधी विवादों के निपटाने की शक्ति उच्च न्यायालय को दे दिया गया |जिसकी अपील उच्चतम न्यायालय मे कि जा सकगी |   

20 वाँ संविधान संशोधन 1966

  इस अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया अनु.233 (क) जोड़कर अनियमितता के आधार पर नियुक्त कुछ जिला न्यायाधिशो की नियुक्य को वैधता प्रदान किया गया था |यह संशोधन चन्द्रमोहन बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के   मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के कारण करना पड़ा |

21 वाँ संविधान संशोधन 1967 

  इसके तहत सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची के अन्तर्गत पन्द्रहवीं भाषा के रूप में शामिल किया गया |

22वाँ संविधान संशोधन 1969.ई 

  इसके तहत असम से अलग करके एक नया राज्य मेघालय बनाया गया |

23वाँ संविधान संशोधन 1969

  इसके अंतर्गत संसद तथा विधानमंडलों  में अनुसूची जाती ,अनुसूची जनजाति तथा आंग्ल -भारतीय समुदाय के लोगो के लिए आरक्षण को दस वर्षों के लिए पुनः बढ़ा दिया गया |

24 वाँ संविधान संशोधन 1971

  यह संशोधन गोलकनाथ के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये  गये निर्णय से उत्पन्न कठिनाईयों को दूर करने केलिए पारित किया गया तथा |इस संशोधन द्वारा मूल अधिकारों सहित संविधान में संशोधन करने के संसद के     अधिकारी बारे में सभी प्रकार के संदेहों को दूर करने के लिए अनु .13 और अनु. 368 में संशोधन किया गया |अनु.368 द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया कि इसमें संविधान संशोधन करने की प्रक्रिया और शक्ति दोनों   शामिल है तथा अनु.13 की  कोई बात संविधान संशोधन विधि की लागू नही होगी    

  • अनु.13 में एक नया खण्ड (4)जोड़कर यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि अनु.13 के अर्थान्तर्गत अनु.368 के अधीन पारित संवैधानिक संशोधन ‘विधि ‘नही है |केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने संविधान के (24वें )संशोधन अधिनियम को विधिमान्य घोषित किया | 

25 वाँ संविधान संशोधन 1971

इसे बैकों के राष्टीयकरण के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय से उत्पन्न कठिनानाईयों को दूर करने के लिए पारित किया गया था | 

  • अनु. 31 (2)में ‘ प्रतिकर ‘के स्थान पर धनराशि शब्द रखा गया | 
  • एक नया अनु. 31 (ग)जोड़कर प्रावधानित किया गया कि अनु. 39 के खण्ड (ख)और (ग)में वर्णित निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की विधिमान्यता को इस आधार पर न्यायालय में चुनोती नहीं दी जायेगी कि वे अनु. 14, 19, मूल अधिकारों से असंगत है या उन्हें कम करती या छिनती है | 
  •  केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य के वाद में उच्चतम न्यायालय ने इस संशोधन के कुछ भाग को अवैध घोषित कर दिया था | 

26 वाँ संविधान संशोधन 2971

इसे माधव राय सिंधिया बनाम भारत संघ (प्रीवी पर्स मामले )में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय की कठिनाईयों को दूर करने के लिए पारित किया गया था |इस मामले में न्यायालय ने भूतपूर्व राजाओं के विशेषाधिकारों को समाप्त करने वाले राष्ट्रपति के अध्यादेश को अंसवैधानिक घोषित कर दिया था |

  • इस संशोधन द्वारा संविधान से अनु. 291 और 362 को निकाल दिया गया जो इन विषयों से सम्बन्धित थे और एक नया अनु. 363 (क)जोड़कर भूतपूर्व राजाओं के प्रिवीपर्स तथा विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया |

27 वाँ संविधान संशोधन 1971 

इसके अंतर्गत मिजोरम एंव अरुणाचल प्रदेश को संघशासित प्रदेशों के रूप में स्थापित किया गया |इसके लिए दो नये अनु. 239 (ख)और 371 (ग)जोड़े गये |

28वाँ संविधान संशोधन 1972 

इस संशोधन द्वारा भारतीय सिविल सर्विस (ICS)अधिकारियों को प्राप्त विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया |इसके लिए अनु. 312A को संविधान में जोड़ लिया गया तथा अनु. 314 को निरसित कर दिया गया | 

29वाँ संविधान संशोधन 1972

इसके तहत केरल भू-सुधार (संशोधन )अधिनियम, 1969 तथा केरल भू सुधार (संशोधन )अधिनियम ,1971 को संविधान की नोंवी अनुसूची में रख दिया गया , जिससे इसकी संवैधानिक वैधता को न्यायालय में चुनोती न दी जा सके | 

30वाँ संविधान संशोधन 1972

इसके द्वारा संविधान के अनु. 133 में संशोधन किया गया |

  • सर्वोच्च न्यायालय में दीवानी विवादों की अपील के लिए 20 ,000 रुपए से अधिक मूल्य की सीमा समाप्त कर दिया गया |
  • संशोधित अनु. के अनुसार अब दीवानी-मामलों में उच्च न्यायालय के किसी निर्णय , अन्तिम आदेशों के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील करने के लिए मामले में कोई ‘सर्वाजनिक महत्व  का सरवान प्रश्न ‘अंतर्ग्रत होना आवश्यक है | 

31 वाँ संविधान संशोधन 1973 

इसके तहत संविधान के अनु.81 में संशोधन कर लोकसभा के सदस्यों की संख्या को 525 से बढ़ाकर 545 कर दिया गया है |तथा केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व 25 घटाकर 20 कर दिया गया |

 32 वाँ संविधान संशोधन 1973 

इसके द्वारा अनु.371 में संशोधन किया गया और अनु. 371 D तथा 371 E  को जोड़ा गया |अनु.371 D आन्ध्र प्रदेश के लिए विशेष प्रावधान करता है जबकि अनु.371E  संसद को केन्द्रीय विश्वविधालय की स्थापना के लिए नियम बनने का अधिकार प्रदान करते है | 

33वाँ संविधान संशोधन 1974 

यह संशोधन गुजरात में हुई घटनाओं के परिणाम स्वरूप पारित किया गया था |वहाँ विधान सभा के सदस्यों को बलपूर्वक तथा डरा-धमका कर विधान सभा से इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया गया था |इसके द्वारा अनु. 101 और 190 में सम्बोधित किया गया |  

  • इसके तहत संसद एंव विधानसभा सदस्यों द्वारा दबाव में या जबरदस्ती किए जाने पर इस्तीफा देना अवैध घोषित किया गया एंव अध्यक्ष को यह अधिकार प्रदान किया गया कि सिर्फ स्वेच्छा से दिए गए एंव उचित त्यागपत्र को ही स्वीकार करें |  

34वाँ संविधान संशोधन 1974

इस संशोधन द्वारा संविधान की नवीं अनुसूची में विभिन्न राज्यों द्वारा पारित 20 भूमि सुधार अधिनियमों को सम्मिलित किया गया |

35वाँ संविधान संशोधन 1974

इसके तहत संविधान में अनु. 2- (क)को जोड़कर कर सिक्किम को संरक्षित राज्य का दर्जा समाप्त कर उसे ‘सह-राज्य के रूप में भारत में शामिल किया गया | 

36वाँ संविधान संशोधन 1975

इसके द्वारा अनु. 2-(क)को निरसित कर सिक्किम को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करते हुए भारत के 22 वें राज्य के रूप में संविधान की प्रथम अनुसूची में स्थान दिया गया तथा अनु. 371(च)में इसके लिए विशेष प्रावधान किया गया 

37वाँ संविधान संशोधन 1975

इस संशोधन द्वारा अनु. 239(क)और 240 में संशोधन किया तथा और अरुणाचल प्रदेश के लिए विधानसभा और मंत्रिपरिषद की स्थापना के लिए उपबन्ध किया गया है | 

38वाँ संविधान संशोधन 1975

इस स्न्शिधं का मुख्य उद्देश्य अनु. 352के अधीन आपात की स्थिति की घोषणा करने में राष्ट्रपति के ‘समाधान‘के प्रश्न को अवाद-योग्य (Non Justiciable)बनाना था |

  • इसके द्वारा अनु. 352 में दो नये खण्ड (4)और (5), अनु. 356 खण्ड (5)और अनु. 359 में खण्ड (क) और अनु. 360 में खण्ड (5)जोड़ा गया है | 
  • इसके द्वारा अनु. 123 और 213 तथा 239 (ख )में संशोधन कर राष्ट्रपति, राज्यपाल तथा उपराज्यपालों द्वारा अध्यादेश जरी करने के मामले में उनके समाधान के प्रश्न को न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया गया था| 

39 वाँ संविधान संशोधन 1975 

इस संशोधन द्वारा यह उपबन्ध किया गया है कि राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति ,लोकसभा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री के निर्वाचन सम्बन्धी विवादों को न्यायालय में चुनोती नही दी जा सकेगी |ऐसे विवाधो की सुनवाई संसद विधि द्वारा स्थापित एक जन -समिति (Forum) द्वारा किये जाने का प्रावधान किया गया है |ज्ञानव्य है कि अनु.71 के तहत राष्टपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन सम्बन्धी मामलो पर सर्वोच्च न्यायालय को अधिकारिता थी |44 वें संविधान संशोधन द्वारा यह प्रावधान पूर्ववत कर दिया गया | 

40 वाँ संविधान संशोधन 1976 

इसके द्वारा अनु.297 में संशोधन कर संसद को समय -समय पर विधान बनाकर भारत के राज्य क्षेत्रीय सागर खण्ड (Territorel waters) ,महाद्वीपीय मगनतट ,समुन्द्र के नीचे की सब भूमियों (Continental Shelf)और आर्थिक क्षेत्र ( Economic Zone)की  सीमओं को निर्धारित करने की शक्ति प्रदान ककिया  गया |इसके पूर्व राज्य क्षेत्रीय सागर -खण्ड आदि की सीमाओं का निर्धारण राष्ट्रपति द्वारा जरी उद्घोषणा द्वारा किया गया था | 

41 वाँ संविधान संशोधन 1976 

इस संशोधन द्वारा संविधान की पाँचवी अनुसूची में अनुसूचित जनजातियों के विकास की द्रष्टि से संशोधन किया गया है |इसके द्वारा अनु. 316 में संशोधन करके लोकसेवा आयोग के सदस्यों की सेवानिव्रत्ती की आयु को 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दिया गया है |

42 वाँ संविधान संशोधन 1976 

तीसरे आपात काल के दोरान प्रधानमन्त्री इन्दिरा गाँधी की सरकार द्वारा किया गया यह संशोधन अब तक पारित सभी संशोधनों में सबसे व्यापक था |इसके द्वारा संविधान में 2 नये अध्याय (4- क ), ( 14-क ) और 9 नये अनु. को जोड़ा गया तथा 52 वें अनु. में संशोधन किया गया था |इसकी व्यापकता के कारण ही इस संशोधन को लघु संविधान की संज्ञा दी जाती है |प्रमुख परिवर्तन अधोलिखित हैं _

  • संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी पंथनिरपेक्ष और अखंडता ‘(Socialist, Secular and Integrity)शब्दों को जोड़ा गया |
  • अनु. 31 (ग)में संशोधन कर सभी निति निदेशक तत्वों को मोलिक अधिकारों पर प्राथमिकता प्रदान किया गया तथा राज्य के निति निदेशक तत्वों का विस्तार करते हुए निम्न तीन निदेशक तत्वों की संविधान में शामिल किया गया है (i) समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता (अनु. 39 क ), (ii) उधोगों के प्रबन्ध में कर्मकारों का भाग लेना (अनु. 43-क ), (IAS :2017) (iii) पर्यावरण  (Environment)की रक्षा और सुधार तथा वन और वन्य जीवों की सुरक्षा (अनु. 48-क )
  • संविधान में भाग -4 (क ) अनु. 51 (क )जोड़कर 10 मोलिक कर्तव्यों का समावेश किया गया |ध्यातव्य है कि वर्तमान में मोलिक कर्तव्यों की संख्या 11 है |
  • अनु. 74 में संशोधन कर यह स्पष्ट कर दिया गया कि राष्टपति मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य होगा |
  • इस संशोधन द्वारा अनु. 368 में दो नये खण्ड (4 ) और खण्ड (5 ) जोड़े गये |खण्ड (4 )यह उपबन्धित करता था कि संसद द्वारा किए गये संविधान संशोधनों को न्यायालय में चुनोती नहीं दी जा सकेगी तथा (5 ) संदेह के निवारण के लिए यह घोषित करता था कि इस अनु. के अन्तर्गत संविधान के उपबंधो को जोड़ने परिवर्तित करने या निरसित करने के लिए संसद की विधायी शक्ति पर कोई परिसीमन नहीं होगा |
  • इस संशोधन द्वारा वन, सम्पदा, शिक्षा, जनसंख्या नियन्त्रण तथा परिवार नियोजन, बाट तथा माप, जानवर तथा पक्षियों को सुरक्षा आदि विषयों को समवर्ती सूचि के अन्तर्गत कर दिया गया |
  • लोकसभा और विधानसभाओं की अवधि को पांच से बडाकर छह वर्ष कर दिया गया |  
  • सभी विधानसभाओं एवं लोकसभा की सीटों की संख्या को 2001तक के लिए स्थिर कर दिया गया | 
  • आपात उपबन्ध में निम्न दो उपबन्ध किए गये -(i) राष्ट्रपति पुरे देश के साथ-साथ अब देश के किसी एक भाग में भी अनु. 352 के तहत आपात की घोषणा कर सकेगा |(ii) अनु. 356के तहत राज्यों में आपात घोषणा के पश्चात् संसद द्वारा अनुमोदन के बाद छ: महीने लागू रह सकती थी , अब यह एक वर्ष तक लागू रह सकती है | 
  • इस संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में एक नया भाग 14 -(क ) जोड़ा गया |इसमें दो अनु. (223 (क )और 223 (ख ) हैं |इसके तहत सिविल सर्वेन्ट्स के लिए न्यायधीकरणों की स्थापना की व्यवस्था की गयी है |
  • केंद्र को यह अधिकार दिया गया कि वह राज्यों में केन्द्रीय सुरक्षा बलों को तैनाद कर सकते हैं |
  • संसद को यह अधिकार दिया गया कि वह निर्णय कर सकती है कि कोन हा पद लाभ का पद है |
  • यह प्रावधान किया गया कि संसद तथा राज्य विधानमंडलो के लिए गणपूर्ति आवश्यक है |

43 वाँ संविधान संशोधन 1977

इसके द्वारा 42 वें संविधान संशोधन की कुछ धाराओं को निरस्त किया गया 

44 वाँ संविधान संशोधन 1978 

यह संशोधन भी अत्यन्त व्यापक एवं महत्वपूर्ण हैं इसे जनतादल की सरकार ने 42 वें संविधान संशोधन द्वारा किये गये अवांछनीय परिवर्तनों को समाप्त करने के लिए पारित किया था |इसके द्वारा किये गये प्रमुख संशोधन निम्नलिखित हैं _ 

  • अनु. 352 में राष्ट्रिय आपदा की उद्घोषणा का आधार ‘आन्तरिक अशान्ति ‘के स्थान पर ‘सशस्त्र विद्रोह को रखा गया |अतः अब राष्ट्रपति आपात की उद्घोषणा ‘आंतरिक अशान्ति ‘के आधार पर नही की जा सकती बल्कि ‘सशस्त्र विद्रोह ‘के आधार पर की जाती हैं |
  • यह भी उबन्धित किया गया राष्ट्रपति राष्ट्रिय आपात की उद्घोषणा तभी करेगा ,जब उसे मंत्रिमंडल द्वारा इसकी लिखित सुचना दी जय |
  • सम्पति के मूलाधिकार को समाप्त करके इसे अनु.300 क,के तहत विधिक अधिकार का दर्जा प्रदान किया गया |इसके लिए अनु. 31 तथा अनु.19 (1) (च) को निरसित किया गया 
  • अनु.74 में पुनः संशोधन कर राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया कि वह मंत्रिमंडल की सलाह ,को एक बार पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है किन्तु पुनः दी गई सलाह को मानने के लिए बाध्य होगा |
  • लोक सभा तथा राज्य विधान सभाओं की अवधि पुनः 5 वर्ष कर दी गयी |
  • उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रिपति तथा उपराष्ट्रपति के निर्वाचन सम्बन्धी विवाद को हल करने की अधिकारिता पुनः प्रदान कर दी गई |

45 वाँ संविधान संशोधन 1978

इसके द्वारा लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओ में अनुसूचित जातियों ,अनुसूचित जनजातियों तथा एंन्लो इंडियन के लिए सीटों का आरक्षण पुनः 10 वर्ष (1990  तक ) के लिए दिया गया |

46 संविधान संशोधन 1982 

इसके व्दारा कर चोरी रोकने के लिए ,कुछ वस्तुओं के सम्बन्ध में बिक्रीकर की समान दरें और वसूली की एक समान व्यवस्था को अपनाया गया |

47 वाँ संविधान संशोधन 1984 

इसके द्वारा संविधान की नवीं अनुसूची में कुछ और अधिनियमों की जोड़ा गया |

48 वाँ संविधान संशोधन 1984 

इसके द्वारा संविधान के अनु.356 (5)में परिवर्तन करके यह प्रावधान किया गया कि पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि को दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है

49 वाँ संविधान संशोधन 1984 

इसके द्वारा अनु.244 में संशोधन किया गया तथा छठी अनुसूची के प्रावधानों को त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्रों पर लागू किया गया एवं त्रिपुरा में स्वायतशासी जिला परिषद की स्थापना का प्रावधान किया गया |

50 वाँ संविधान संशोधन 1984 

इसके द्वारा अनु.33 को पुनः स्थापित करके सुरक्षा बलों के मुलाधिकारो को  प्रतिबन्धित किया गया |

51 वाँ संविधान संशोधन 1984 

इस संशोधन द्वारा अनु. 330 (1)और 332 (1)में संशोधन किया गया है ,नागालेंड ,और मेघालय के स्वतंत्र राज्य बनने के कारण इस संशोधन की आवश्यकता पड़ी |इस संशोधन द्वारा मेघालय ,नागालेंड ,अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम की अनुसूचित जनजातियो को लोकसभा में आरक्षण प्रदान किया गया तथा नागालेंड और मेघालय की विधानसभाओ में जनजातियों के लिए आरक्षण की क्यच्स्था की गया |

52 वाँ संविधान संशोधन 1985 

इसके द्वारा संविधान में 10 वीं अनुसूची को जोड़कर दल बदल रोकने के लिए प्रावधान किया गया था| तथा अनु.101,102,190,191 को संशोधन करके यह उपबंध किया गया कि यदि संसद अथवा विधानमंडल का कोई सदस्य अपने दल का त्याग करता है या निर्वाचन के लिए नामित करने वाली पार्टी के द्वारा दल से निष्कासित कर दिया जाता है ,अथवा कोई स्वतंत्र सदस्य सदन में सीट प्राप्त करने के 6 महीने बाद किसी अन्य राजनितिक दल में शामिलहो जाता है ,तो ऐसे सदस्यों की सदस्या  सदन से समाप्त हो जाएगी |    

53 वाँ संविधान संशोधन 1986 

इस संशोधन द्वारा संघ क्षेत्र मिजोरम को भारत के 23 वें राज्य का दर्जा प्रदान किया गया तथा उसे विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए अनु. 371 छ जोड़ा गया |

54 वाँ संविधान संशोधन 1986 

अनुसूची-2 (भाग घ )में संशोधन कर सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधिशों के वेतन में व्रध्दी किया गया |अनु .125 ,221 तथा दूसरी अनुसूची में संशोधन करते हुए भविष्य में भी न्यायाधीशों के वेतन में परिवर्तन करने का अधिकार संसद को प्रदान किया गया 

55 वाँ संविधान संशोधन 1986 

इसके द्वारा अरुणाचल प्रदेश को भारत के 24 वें राज्य का दर्जा प्रदान किया गया तथा अनु.371 ज को जोड़कर उसके लिए विशेष व्यवस्था की गयी |

56 वाँ संविधान संशोधन 1987 

इसके द्वारा गोवा को दमन व दिव से अलग कर राज्य का दर्जा  प्रदान कर दिया गया तथा दमन और दिव को केन्द्रशासित प्रदेश के रूप मे ही  रहने दिया गया ,साथ ही अनु .371 झ  अन्तः स्थापित कर गोवा के लिए 30 सदस्यीय विधान सभा का प्रावधान किया गया | 

57 वाँ संविधान संशोधन 1987 

इसके द्वारा अनु.332 में संशोधन कर मेघालय ,मिजोरम ,नागालेंड तथा अरुणाचल प्रदेश की विधान सभाओ में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण की व्यवस्था की गयी| 

58 वाँ संविधान संशोधन 1987 

इसके द्वारा संविधान में अनु.394 -क जोड़कर संविधान सभा के सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किये गये ‘संविधान के हिंदी में प्राधिकृत ‘पाठ को प्रकाशित करने  लिए राष्ट्रपति को अधिकार दिया गया |   

59 वाँ संविधान संशोधन 1988 

इसके द्वारा पंजाब के बारे में निम्न्लिखित प्रावधान किया गया था |

  • पंजाब में राष्ट्रपति शासन छ:-छ:महीने करके अधिकतम तीन वर्ष तक केलिए लागू जा सकता है |
  • केंद्र पंजाब में आंतरिक अशान्ति के आधार पर आपात की घोषणा कर सकता है |
  • अनु.21 द्वारा  प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा जीवन के अधिकार को राष्ट्रपति केवल पंजाबमें निलम्बित कर सकता है | 

60 वाँ संविधान संशोधन 1988

इसके द्वारा अनु .276 (2)में संशोधन कर राज्य या स्थानीय निकाय द्वारा लगाये जाने वाले व्यवसाय कर की सीमा 250 रूपये से बढ़ाकर 2500 रूपये प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष कर दिया गया |

61 वाँ संविधान संशोधन 1989

इसके द्वारा अनु.326 में संशोधन करके लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओ के चुनाव में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटा करके 18 वर्ष कर दिया गया |

62 वाँ संविधान संशोधन 1989

इसके द्वारा अनु.334 में संशोधन कर लोकसभा एवं विधान सभाओ में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण 10 वर्ष के लिएबढ़ा कर सन 2000  तक कर दिया गया | 

63 वाँ संविधान संशोधन 1990

इसके द्वारा 59 वें संविधान संशोधन द्वारा की गयी पंजाब राज्य केलिए विशेष आपातकालीन की व्यवस्था को निरसित कर दिया गया |

64वाँ संविधान संशोधन 1990

इसके द्वारा अनु.356(4)में तीसरा ‘परन्तुक जोड़कर पंजाब के सम्बन्ध में आपात कल की अधिकतम अवधि ‘तीन वर्ष ‘की जगह ‘तीन वर्ष 6 मह ‘कर दिया गया |

65 वाँ संविधान संशोधन 1990

इसके द्वारा अनु.338 में संशोधन अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष अधिकारी के स्थान पर एक अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति राष्ट्रिय आयोग के गठन का प्रावधान किया गया |

 66 वाँ संविधान संशोधन 1990

इसके द्वारा विभिन्न राज्यों द्वारा बनाये गये ,भूमि अधिनियमों को नोबी अनुसूची में प्रविष्टि संख्या 202 के पश्चात 203 से 257 तक जोड़कर न्यायिक समीक्षा के क्षेत्र से बहर कर दिया गया |

67 वाँ संविधान संशोधन 1990

इसके द्वारा अनु.356 के तीसरे परन्तुक में संशोधन करके पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अविधि अधिकतम 4 वर्ष तक कर दी गयी |

68 वाँ संविधान संशोधन 1991 

इसके द्वारा अनु.356 के तीसरे परन्तुक में पुनः संशोधन करके पंजाब में राष्ट्रपति शासन की  अधिकतम अविधि 5  वर्ष तक बढ़ा दी गयी ,क्योकि वहाँ चुनाव करना सम्भव नही था |

69 वाँ संविधान संशोधन 1991 

इस अधिनियम द्वारा संविधान में दो नये अनुच्छेद ,अनु.239 क क तथा 239 क ख जोड़े गये जिनके द्वारा संघ राज्य क्षेत्र दिल्ली को विशेष दर्जा प्रदान किया गया है ,तथा उसका नाम ‘राष्ट्रिय राजधानी क्षेत्र दिल्ली ‘रखा गया और उसके लिए 70 सदस्यीय विधान सभा तथा 7 सदस्यीय मंत्रिपरिषद का उपबन्ध किया गया |

70 वाँ संविधान संशोधन 1992 

इसके द्वारा दिल्ली तथा पाण्डिचेरी संघ राज्य क्षेत्रों के विधान सभा सदस्यों को राष्टपति के निर्वाचक मण्डल में शामिल करने का प्रावधान किया गया |इसके लिए अनु.54 में एक स्पष्टीकरण जोड़ा गया |

71 वाँ संविधान संशोधन 1992 

इसके तहत संविधान की आठवीं अनुसूची में तीन और भाषाओं कोंकणी , मणिपुरी और नेपाली को सम्मिलित किया गया |इनको मिलकर आठवीं अनुसुची में अब भाषाओं की संख्या 18 हो गई |

72 वाँ संविधान संशोधन 1992 

इसके द्वारा त्रिपुरा विधानसभा में स्थानों की संख्या बढ़ाकर 60 कर दी गयी तथा उसी अनुपात में अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों को आरक्षित कर दिया गया |

73 वाँ संविधान संशोधन 1992 

इसके द्वारा संविधान में अनुसूची -11, भाग -9 तथा अनु. 243 के पश्चात अनु. 243A-243’O’, को जोड़कर भारत में ‘पंचायती राज ‘ की स्थापना का उपबन्ध किया गया |

74 वाँ संविधान संशोधन 1992 

इसके द्वारा संविधान में अनुसुची -12 तथा भाग 9(क) (अनु. 243P- 243ZG) जोड़कर नगरपालिका , नगर नियम तथा नगरपरिषदों के गठन एवं संरचना आदि से सम्बन्धित प्रावधान किया गया |

75 वाँ संविधान संशोधन 1994

इस संशोधन द्वारा अनु. 223 (ख)में संशोधन कर मकान मालिक व किराएदारों के विवादों को शीघ्र निपटाने  के लिए न्यायधीकरणों की स्थापना करने का प्रावधान किया गया है |  

76 वाँ संविधान  संशोधन 1994 

इसके द्वारा संविधान की नवीं अनुसूची में संशोधन किया गया है और तमिलनाडू सरकार द्वारा पपारित पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नोकरीयों में 69 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने अधिनियम को नवीं अनुसूची में शामिल कर  दिया गया  |

77 वाँ संविधान संशोधन 1995 

इसके द्वारा अनु. 16 में एक नया खण्ड (4क )जोड़ा गया है जो यह उपबन्धित करता है कि अनु. 16 की कोई बात राज्य के अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की  राय में राज्याधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है प्रोन्नति में आरक्षण के लिए कोई उपबन्ध करने में निवारित (वर्जित ) नहीं करेगी |ध्यातव्य है कि मण्डल आयोग के मामले में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया था कि सरकारी नोकरियों में, प्रोन्नति में आरक्षण नहीं दिया जा सकता है |इस निर्णय के प्रभाव को दूर करने के लिए यह अधिनियम पारित किया गया था |  

78 वाँ संविधान संशोधन 1995 

इसके द्वारा नवीं अनुसूची में विभिन्न राज्यों द्वारा पारित 27 भूमि सुधार विधियों को समाविष्ट किया गया है |इसके पश्चात 9 वीं अनुसूची में कुल अधिनियमों की संख्या 284 हो गयी |

79 वाँ संविधान संशोधन 1999

इसके द्वारा अनु. 334 में संशोधन कर अनुसूची जाति और अनुसूची जनजाति के लोगों के लिए लोकसभा व राज्य विधान सभाओं में आरक्षण की अवधि को 10 वर्ष के लिए और बढ़ा दिया गया है अब यह व्यवस्था संविधान लागू होने की तिथि से 60 वर्ष अर्थात् 2010तक बनी रहेगी |

80 वाँ संविधान संशोधन 2000 

यह संशोधन 10 वें वित्त आयोग की सिफारश के आधार पर किया गया था इसके द्वारा संघ तथा राज्यों के बीच राजस्व विभाजन सम्बन्धी प्रावधानों (268-272 ) में परिवर्तित किया गया |

81 वाँ संविधान संशोधन 2000 

इस संशोधन द्वारा अनु. 16 खण्ड (4क )के बाद खण्ड (4क )स्थापित कर अनुसूची जातियों, अनुसूची जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गो के लिए 50% आरक्षण की सीमा, को ,उन रिक्तियों के सम्बन्ध में जो उक्त वर्गो के लिए आरक्षित थी और एक वर्ष में भरी नहीं जा सकी हैं , समाप्त कर दिया गया |ध्यातव्य है कि यह संशोधन इंद्रासाहनी बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय के प्रभाव को समाप्त करने के लिए पारित किया गया था | 

82 वाँ संविधान संशोधन 2000 

इस संविधान संशोधन द्वारा राज्यों को संघ या `राज्यों की सरकारी नोकरियों में भर्ती हेतु अनुसूचित जातियों एवं जनजातियो के अभ्यर्थियों के लिए न्यूनतम प्राप्तांको में छुट प्रदान करने अथवा प्रोन्नति में मिल्यांकन मानदंड घटाने की ,अनु.335 के तहत अनुमति प्रदान की गई है | 

83 वाँ संविधान संशोधन 2000 

इस संशोधन के द्वारा अनु.243 ड. के तहत अरुणाचल प्रदेश को पंचायतीराज संस्थाओ में अनुसूचित जाति  के लिए आरक्षण का प्राविधान  न करने की छुट प्रदान की गई है |ध्यातव्य है कि अरुणाचल प्रदेश में कोई अनुसूचित जाति न होने के कारण उसे यह छुट की गई है |

84  वाँ संविधान संशोधन 2001 

इसके द्वारा निर्वाचन क्षेत्रों  के परिसीमन पर 1976 के42  वें  संविधान संशोधन द्वारा लगे प्रतिबन्ध को हटाते हुए 1991की जनगणना के आधार पर परिसीमन की अनुमति दी गयी तथा लोकसभा व विधानसभाओ की सीटों की संख्या 2026 के बाद होने वाली प्रथम जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने तक परिवर्तित न करने का प्रावधान किया गया | 

85 वाँ संविधान संशोधन 2001   

इसके तहत अनु.16 के खण्ड (4 क) में संशोधन करके शब्दावली ‘किसी वर्ग की प्रोन्नति के मामले में ‘ के स्थान पर शब्दावली ”किसी वर्ग के  प्रोन्नति के मामले में ‘ भुतलक्षी ज्येष्ठता रखा गई है |इसका तात्पर्य यह है कि इन वर्गो की प्रोन्नति भूतलक्षी (17 जून 1995)प्रभाव से दी जाएगी |

86 वाँ संविधान संशोधन 2002 

इसके द्वारा 6 से 14 वर्ष तक के बच्चो के लिए अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने सम्बन्धी प्रावधान किया गया है |इसके लिए अनु.21 क संविधान में जोड़ा गया है तथा अनु.45 तथा अनु.51 संविधान किया गया है |अनु.51 क के तहत संशोधन द्वारा 11 वाँ कर्तव्य जोड़ा गया है| 

87 वाँ संविधान संशोधन 2003  

इसके द्वारा परिसीमन में जनसंख्या का आधार 1991की जनगणना के स्थान पर 2001कर दिया गया |

88 वाँ संविधान संशोधन 2003  

इसके द्वारा अनु.268 क,को जोड़कर सेवाओं पर (Service Tax) का प्रावधान किया गया |सेवा कर को सातवीं अनुसूची के संघीय सूचि में रखा गया |

89 वाँ संविधान संशोधन 2003  

इसके द्वारा अनु.338 क को जोड़कर अनुसूचित जनजाति के लिए प्र्थक्र राष्ट्रिय आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया |

90वाँ संविधान संशोधन 2003

इसके द्वारा समोम विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों और गैर अनुसूचित जनजातियो का प्रतिनिधित्व बोड़ोलैंड के गठन के पश्चात भी यथावत रखने का प्रावधान किया गया |

91 वाँ संविधान संशोधन 2003

इसके द्वारा 10 वीं अनुसूची में संशोधन कर दल -बदल व्यवस्था की और कड़ा किया गया है |अब केवल सम्पूर्ण दल के विलय को मान्यता है इसके द्वारा अनु.75 तथा 164 में संशोधन  कर मंत्रिपरिषद का आकार भी नियत किया गया अब केंद्र तथा राज्य में मंत्रिपरिषद की सदस्य संख्या लोक  सभा तथा विधान सभा की कुल सदस्य संख्या का 15 %से अधिक नही होगी|किन्तु जहाँ सदन की सदस्य संख्या 40 या उससे कम है ,वहाँ अधिकतम 12 होगी |

92 वाँ संविधान संशोधन 2003

इसके द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में संशोधन कर चार नई भाषओं बोडो ,डोगरी ,मैथिली और संथाली को शामिल किया गया है |इस प्रकार आठवीं अनुसूची में वर्तमान में कुल 22 भाषायें सम्मिलित हो गयी है |

93 वाँ संविधान संशोधन 2005 

इसके द्वारा सामाजिक  शैक्षिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षिक संस्थानों में प्रवेश सम्बन्धी आरक्षण का प्रावधान किया गया है |अनु.15 में एक नया अनु.15 (5)को जोड़ते हुए स्पष्ट किता गया है की इस अनु.को या अनु. 19 (1)(छ)

की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक द्रष्टि से पिछड़े हुए नागरिको के किन्ही वर्गों की उन्नति के लिए कोई प्रावधान बनने से नही रोकेगी,किन्तु अनु,30 (1)के अन्तर्गत अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान इस प्रव्ह्दन के दायरे में नही जाएंगे |

94 वाँ संविधान संशोधन 2006 

छतीसगढ़ और झारखण्ड राज्यों के पुनर्गठन के परिणामस्वरूप बिहार और मध्य प्रदेश का सम्पूर्ण अनुसूचित क्षेत्र झारखण्ड में चला गया |अन्तः इस संशोधन अधिनियम द्वारा अनु.164 के खण्ड (1)में बिहार राज्य के स्थान पर ‘छतीसगढ़ और झारखंड ‘ शब्दों को रखा गया है |ध्यातव्य है कि इन राज्यों में जनजातियो के कल्याण हेतु एक मंत्री प्रावधान अनु.164 (1) के परन्तुक किया गया है |

95  वाँ संविधान संशोधन 2009  

इसके द्वारा अनु.334 में स्ब्शोधं कर शब्दावली 60 वर्ष के स्थान पर शब्दावली 70 वर्ष गोद दिया गया अर्थात् लोक सभा एवं राज्य विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों,जनजातियों के लिए चुनावी सीटों के आरक्षण तथा आंग्ल भारतीय सदस्यी के मनोनयन की व्यवस्था को 26 जनवरी 2020 तक के लिए बढ़ा दिया गया है |

96 वाँ संविधान संशोधन 2011   

इसके द्वारा आठवीं अनुसूची में संशोधन कर 15 वीं प्रविष्टि की भाषा का नाम ‘उड़िया (Oriya) के स्थान पर ओड़िया (Odia) प्रतिस्थापित किया गया है |’

संविधान का 97 वाँ संशोधन 2011

इस संशोधन के द्वारा अनु.19 (1)(c ) में’सहकारी समितियां जोड़ा गया (UPPSC: M:2016) यह संशोधन सहकारी समितियों के स्वैच्छिक विनिर्माण ,स्वायत संचालन ,लोकतांत्रिक निंयत्रण तथा व्यवसायिक प्रबन्धन के किए राज्य के नीति निर्देशक तत्व के रूप में अनु.43 ख अन्तः स्थापित करता है |स्ब्शोधं द्वारा एक नया भाग -9 ख भी अन्तः स्थापित करता है | जिसमे (अनु.243 ZH-अनु. 243 -ZT तक ) कुल 13 अनु.है |यह संशोधन सहकारी समितियों को संवैधानिक स्तर प्रदान करता है |

98 वां संशोधन 

इस संशोधन (2012)के द्वारा अनुच्छेद 371(जे) को जोड़कर कर्नाटक के राज्यपाल की शक्तियों में विस्तार कर कर्नाटक -आन्ध्र प्रदेश के क्षेत्र के विकास का उत्तरदायित्व सौपा गया है इसके लिए राज्यपाल को प्र्थक्र विकास परिषद स्थापित करके इस क्षेत्र पर विकास व्यय के साम्यवत कोष को आबंटित करने की शक्ति प्रदान की गयी |

 संविधान का 99 वाँ संशोधन 2014

इस संशोधन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा स्थानान्तरण के लिए 1993से चली आ रही कोलेजियम प्रणाली के स्थान पर नए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग  (National Judicial Appointments Commins -seon -NJAC)का प्रावधान किया गया तथा इसके द्वारा संविधान में तीन नए अनुच्छ्द 124A,124 B तथा 124 C का समावेश किया गया था ; साथ ही संविधान के अनुच्छ्द 127,128,217 ,222,224,224,Aऔर 231 में संशोधन किया गया था | किन्तु 14 अक्टूबर ,2015 को न्यायमूर्ति जे 0 एस0 केहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संशोधन पीठ ने 4 :1 के बहुमत से ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम और 99 वें संविधान संशोधन को रद्द कर कोलेजियम प्रणाली को पुनः बहाल कर दिया |

100 वाँ संविधान संशोधन अधि .2015

इस संशोधन अधिनियम द्वारा भारत और बांग्लादेश के मध्य 1974 में हस्ताक्षरित ‘भू-सीमा समझोता (Land B0undary Agreement )’और सतत्सम्बन्धी प्रोटोकोल का अनुमोदन किया गया है इस संशोधन के अनुसार भारत के बाग्लादेश में स्थित 111 एनक्लेव (बस्तियों )बांग्लादेश को प्राप्त हुए हैं  तथा बांग्लादेश के भारत में स्थित 51 एनक्लेव भारत में शामिल किए गए हैं |इन एनक्लेवों को 31 जुलाई ,2015 की मध्य रात्रि से हस्तांतरित मन लिया गया है तथा सीमांकन का कार्य दोनों के सर्वेक्षण विभागों द्वारा 30 जून 2016 तक पूर्ण कर लिया गया |भूक्षेत्र के आधार पर भारत की जहां बांग्लादेश की 7,110.02 एकड़ भूमि भारत हस्तांतरितहुई है , उल्लेखनीय है कि इस अधिनियम के माध्यम से भारत के प0 बंगाल ,असोम ,त्रिपुरा एवं मेघालय राज्यों के क्षेत्रों से संबधित संविधान की प्रथम अनुसूची के उपबंधो में संशोधन किया गया |

101 वाँ संविधान संशोधन 2016

इस सं. संशोधन अधिनियम का सम्बन्ध GST (Goods and Service Tax ) से है |8 सितम्बर, 2016 को संविधान (122 वाँ संशोधन )विधेयक, 2014 राष्ट्रपति के हस्ताक्षरोपरांत संविधान (101 वां संशोधन )अधिनियम, 2016 के रूप में अधिनियमित हुआ |राज्य सभा द्वारा 3 अगस्त, 2016 को तथा लोकसभा द्वारा 8 अगस्त, 2016 को यह संशोधन विधेयक पारित किया गया था |  

यह विधेयक संघ एवं दोनों राज्यों से सम्बन्धित है अतः इसे अधिनियमित होने से पूर्व कम से कम आधे राज्यों के अनुसमर्थन की आवश्कता थी |वर्तमान में आठ राज्यों (जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, केरल, मणिपुर, तमिलनाडू, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड व पश्चिम बंगाल )को छोड़कर अब तक 23 राज्यों \केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा अनुसमर्थित किया जा चुका है इनमे असोम GST को अनुसमर्थन देने वाला पहला राज्य रहा |इस अधिनियम के द्वारा संविधान के भाग 11 (अनुच्छेद 248, 249, एवं 250 ); भाग 12 (अनुच्छेद 268, 269, 270, 271, तथा 286 ); भाग  19 (अनुच्छेद 266 ); भाग 20 (अनुच्छेद 368 ) तथा छठीं, सातवीं अनुसूची में संशोधन किया गया है तथा तीन नये अनुच्छेद (अनुच्छेद 246A, 269A तथा 279A )जोड़े गये जबकि 268A को समाप्त कर दिया गया |    

102 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम , 2018 (123 वाँ संशोधन विधेयक )

इस संशोधन द्वारा अनु. 338 (ख) अंत: स्थापित कर “राष्ट्रिय पिछड़ा वर्ग आयोग ” को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है |तथा अनु. 342 (क )को अंत: स्थापित किया गया है |इस संशोधन के द्वारा अनु. 338 के खण्ड (10) में संशोधन कर अनुसूची जातियों के प्रति निर्देश का अर्थ आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रति निर्देश माना जायेगा तथा अनु. 366 में रक नया खण्ड (26ग ) अतः स्थापित किया गया है | 

103 वाँ संशोधन अधिनियम , 2019 (124  वाँ संशोधन विधेयक )

इस संशोधन के तहत आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को सरकारी सेवाओं तथा शिक्षण समस्याओं में 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान  किया गया, जिसके अंतर्गत अनुच्छेद 15 तथा अनुच्छेद 16 में संशोधन  करके क्रमशः दोनों में ही नया खण्ड 6 अन्तः स्थापित किया गया है|   

104 वाँ संविधान संशोधन अधिनियम 2019 ( 126 वाँ संशोधन विधेयक )

इस संशोधन द्वारा अनुच्छेद 334 में संशोधन कर लोकसभा तथा विधा सभाओं में अनुसूची जनजाति के आरक्षण को 10 वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया है तथा साथ ही साथ लोकसभा एवं राज्यों की विधान सभाओं में आंग्ल- भारतीय समुदाय के नाम निर्देशन को 25 जनवरी, 2020 से समाप्त कर दिया है ध्यातव्य है कि भारत में वर्तमान समय में आंग्ल-भारतीयों की कुल संख्या 296 है |उपरोक्त संशोधन अधिनियम 25 जनवरी, 2020 से प्रभावी हुआ है |   

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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