राज्य किसे कहते हैं? || राज्य की परिभाषा || और उसके तत्व

 

राज्य किसे कहते हैं

राज्य किसे कहते है और उसकी  परिभाषा :-

राज्य किसे कहते हैं? :- विभिन्न वैज्ञानिको तथा अर्थ शार्थीयों ने अपने अपने विचारो में अलग अलग प्रकार से परिभाषाये दी है  जो की कुछ महत्वपूर्ण परिभाषा नीचे दी गयी है :
 अरस्तु ने  कहा है  :“राज्य परिवारों तथा गॉव  का एक समुदाय है इसका उद्देश्य पूर्ण तथा आत्मनिर्भर जीवन की प्राप्त करना है ।”
सिसरो ने  कहा है :- राज्य उस समुदाय को कहते है  जिसमें यह भावना विद्यमान हो कि प्रत्येक व्यक्ति  को उस समुदाय के लाभ को परस्पर साथ मिलकर उपभोग करना है।”

आधुनिक परिभाषाएं:- प्राचीन विचारक के विचार के द्वारा राज्य को एक समुदाय कहा गया है लेकिन आधुनिक विचारको के अनुसार केवल और केवल  मनुष्यों से एक राज्य  का निर्माण नहीं हो सकता बल्कि   राज्य का रूप प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को एक निश्चित क्षेत्र होना अति आवश्यक है ताकि वह इस पर  बसे सके और इनमें शांति तथा व्यवस्था बनाए रखने के लिए कोई राजनेतिक सत्ता होना भी अति आवश्यकता है |

वुडरो विल्सन ने कहा :-“किसी निश्चित देश  के भीतर कानून व्यवस्था के लिए संगठित जनता का होना  राज्य कहलाता  हैं।”

ब्लंशली ने कहा :- “किसी निश्चित जमीन पर राजनीतिक रूप से संगठित व्यक्तियों को राज्य कहते  है।”

कुछ  समय बाद यह समझा गया कि इस प्रकार के संगठन को भी उस समय तक राज्य नहीं कह सकते जब तक उस  संगठन के पास संप्रभुता या सर्वोच्च शक्ति ना हो। इस प्रकार राज्य के आवश्यक तत्वों में संप्रभुता को सम्मिलित किया गया और इस बात को दृष्टि में रखते हुए लास्की ने राज्य की परिभाषा में  कहा है कि “राज्य एक ऐसा प्रा-देशिक समाज है जो सरकार और प्रजा में विभाजित है और अपने निश्चित एक  भौगोलिक क्षेत्र में सभी समुदायों पर सर्वोच्च सत्ता रखता है।”
लेकिन  प्रोफेसर लास्की द्वारा दी गई ये  राज्य की परिभाषा को भी स्वीकारा  नहीं जा सकता क्युकी इसमे  संप्रभुता के जो दो पक्ष होते हैं – आंतरिक पक्ष और विपक्ष, इसमे लास्की ने संप्रभुता का केवल एक  आंतरिक पक्ष का ही विवेचन दिया  है बाहरी पक्ष का जिक्र तक  नहीं।

 गार्नर ने कहा :-  “राजनीति विज्ञान और सार्वजनिक कानून की धारा के रूप में राज्य, कम या अधिक व्यक्तियों का ऐसा संगठन है जो किसी प्रदेश के निश्चित भू-भाग में स्थाई रूप से रहता हो और  बाहरी नियंत्रण से पूर्ण रूप से  स्वतंत्र  हो और जिसका एक ऐसा संगठित शासन हो जिसके आदेश का पालन नागरिकों का विशाल समुदाय स्वभाविक  रूप से करता हो।

गार्नर की  परिभाषा में  राज्य के 4 तत्वों जनसंख्या भूमि शासन एवं संप्रभुता का उल्लेख मिलता  है।

सभी  विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर यह कह सकते है कि राज्य मनुष्यों  का एक ऐसा समूह है, जिन पर  एक निश्चित भू-भाग होता  है और जो राष्ट्रीय या  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी प्रकार का  बिना किसी बाहरी दबाव के अपन  निर्णय ले सकते  हो।

राज्य के कौन कौन  से  तत्व हैं  :-

निम्न परिभाषाएं केआधार पर राज्य के तत्व निम्न हैं :-

1. जनसंख्या:- मानव समाज के गुण के आधार पर राज्य का जन्म हुआ है और जनता से मिलकर ही एक राज्य का निर्माण होता है। अतः अधिकतर लोगो ने  जनसंख्या को राज्य के आवश्यक तत्व के रूप में ग्रहण किया है  , लेकिन  राज्य में  कितनी जनसंख्या होनी चाहिए इसके  संबंध में विद्वानों के विचारों में पर्याप्त मतभेद हैं और अपने विचारों  की आदर्श शासन व्यवस्था और  राज्य की शक्ति के सम्बन्ध में अपने विचारों के आधार पर विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग विचार व्यक्त किए हैं। प्लेटो , अरस्तु , रूसो आदि अर्थशास्त्रi  प्रत्यक्ष प्रजातंत्र शासन को श्रेष्ठ समझते थे और क्योंकि प्रजातंत्र को थोड़ी जनसंख्या वाले राज्य में भी  अपनाया जा सकता है, अतः प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक में आदर्श राज्य का चित्रण करते हुए कहा है कि एक आदर्श राज्य में 5040 नागरिक होने चाहिए। इसी प्रकार अरस्तु के अनुसार राज्य की जनसंख्या लगभग 10,000 होनी चाहिए। दूसरी ओर हिटलर मुसोलिनी तथा अन्य अनेक व्यक्तियों का विचार है कि राज्य एक शक्ति है और यह शक्ति ठीक प्रकार से कार्य कर सकें इसके लिए यह आवश्यक है कि इसमें अधिकतम जनसंख्या हो।

2.- निश्चित क्षेत्र:- डिग्विट और शीले, आदि कुछ विद्वानों तो निश्चित क्षेत्र को राज्य के आवश्यक तत्व के रूप में स्वीकार नहीं करते  है, लेकिन  एक निश्चित क्षेत्र की कमी  में व्यक्तियों द्वारा व्यवस्थित जीवन व्यतीत नहीं किया जा सकता है , इसलिए वर्तमान समय में सभी विद्वान निश्चित क्षेत्र को राज्य के एक आवश्यक तत्व के रूप में स्वीकारते हैं।
ब्लंसली ने  कहा गया है कि “जैसे राज्य का व्यक्तिगत आधार जनता है, वैसे ही उसका भौतिक आधार प्रदेश है। व्यक्ति उसी  समय तक एक  राज्य का रूप धारण नहीं कर सकती जब तक उसका कोई निश्चित प्रदेश न हो।”

अत:  राज्य के महत्वपूर्ण तत्व के रूप में भूमि का अभिप्राय केवल क्षेत्र से ही नहीं है बल्कि उसके अंतर्गत वे सभी प्राकृतिक साधन भी आते  हैं जो किसी देश को स्थल , जल और वायु में प्राप्त हो |

3.- सरकार:- व्यक्तियों का  समूह एक निश्चित क्षेत्र में जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए गठित होता है, की  इन सभी  व्यक्तियों का जीवन कुछ नियमों द्वारा नियमित ना हो और सरकार ही वह संस्था या साधन है जो उन सभी  उद्देश्यों को पूरा  कर सकती है। इसके आलावा  सरकार ही राज्य के सभी  जन समुदाय की इच्छा को काम  में परिवर्तित कर सकती है। यदि  सरकार न हो तो सभी  सभी लोग अपने-अपने फायदे के बारे में  बोलेंगे और कोई भी सही निर्णय नहीं होगा । इसलिए  सरकार एक राज्य का बहुत ही  महत्वपूर्ण तत्व है।

 सरकार राज तंत्र  या प्रजातंत्र  किसी भी प्रकार की हो सकती है लेकिन  वर्तमान समय में प्रजातंत्रात्मक सरकार दूसरी सरकारों से  अधिक लोकप्रिय है।

4.- संप्रभुता;- एक सीमित  क्षेत्र में बसे लोग  तथा सरकार में होते हुए  लोग भी उस समय तक राज्य का निर्माण नहीं कर सकते जब तक इनके पास  संप्रभुता न हो। 

राज्य की संप्रभुता से मतलब  है कि राज्य आंतरिक और बाहरी  रुप से अपना निर्णय खुद ले सके और किसी के दवाब में कोई भी निर्णय न ले उसके पास खुद की शक्ति हो कोई नियम लागू करने के लिए |

साथियों आपने राज्य किसे कहते हैं  को भलीभांति जाना है हम यह आशा करते है आपको समझ आ गया होगी 

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