Indian Federal Parliament |भारत संघीय संसद ( राष्ट्रपति, लोक सभा ,राज्य सभा )

Table of Contents

 संघीय संसद 

  • भारत की संसद राष्ट्रपति, राज्य सभा, तथा लोक सभा से मिलकर बनती है यह अनुच्छेद 79 बताता है
  • साधारण विधेयक संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है राज्यसभा इसको 6 महीने तक रोक सकती है
  • यदि साधारण विधेयक पर कोई विवाद हो जाए तो राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संसद का संयुक्त अधिवेशन बुला सकता है
  • यदि किसी व्यक्ति ने संसद और राज्य विधानमंडल की सदस्यता ग्रहण कर ली है तो उसे 14 दिनों के भीतर बताना होगा कि वह किस का सदस्य रहना चाहता है अन्यथा संसद की सदस्यता समाप्त हो जाएगी

राज्यसभा (उच्च सदन)

  • राज्य सभा के सदस्यों की अधिक से अधिक संख्या 250 हो सकती है राज्यसभा की संरचना अनुच्छेद 80 में बताई गई है
  • वर्तमान समय में यह संख्या 245 है राज्य सभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं यह ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें कला, साहित्य, विज्ञान ,समाज सेवा, या सहकारिता के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या अनुभव है शेष 233 सदस्य संघ की इकाइयों का प्रतिनिधित्व करते हैं
  • राज्यसभा के सदस्यों की  न्यूनतम उम्र सीमा 30 वर्ष होती है
  • राज्यसभा एक स्थाई सदन है जो कभी भंग नहीं होती है इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है इसके एक तिहाई सदस्य प्रति 2 वर्ष बाद सेनानिवृत हो जाते हैं यह अनुच्छेद 83(1) बताता है
  • मंत्री परिषद राज्यसभा के प्रति उत्तरदाई नहीं होती है
राज्य सभा के सदस्यों की संख्या 
राज्य  संख्या 
उत्तर प्रदेश  31
महाराष्ट्र  19
तमिलनाडु  18
बिहार  16
प बंगाल  16
कर्नाटक 12
आंध्रप्रदेश   11
मध्य प्रदेश  11
गुजरात  11
ओडिशा  10
राज्यस्थान  10
केरल  9
पंजाब  7
असम  7
तेलंगाना  7
झारखण्ड  6
छत्तीसगढ़  5
हरियाणा  5
हिमाचल प्रदेश   3
उत्तराखण्ड  3
नागालेंड  1
मिजोरम  1
मेघालय  1
मणिपुर  1
त्रिपुरा  1
सिक्किम  1
 अरुणाचल प्रदेश  1
गोवा  1
जम्मू कश्मीर  4
पुदुचेरी  1
दिल्ली  3
  • राज्यसभा के प्रथम उप सभापति एस. बी कृष्णमूर्ति राय 

राज्यसभा का सभापति एवं उपसभापति अनुच्छेद 89

  1.  भारत का उप राष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है यह अनुच्छेद 89 बताता है
  2. राज्यसभा यथाशीघ्र अपने किसी सदन को अपना उपसभापति सुनेगी और जब-जब उप सभापति का पद रिक्त यानी खाली होता है तब तक राज्यसभा किसी अन्य सदस्य को अपना उपसभापति चुनेगी 

उप-सभापति का पद रिक्त होना या पद त्याग (अनुच्छेद 90)

  1. उप-सभापति यदि राज्यसभा का सदस्य नहीं रहता है तो उसे अपना पद रिक्त करना होगा
  2.  सभापति को संबोधित कर त्यागपत्र द्वारा वह अपना पद त्याग सकेगा
  3.  राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा परंतु इस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की सूचना उसे कम से कम 14 दिन पहले देनी होगी

ध्यान दें:-  जब सभापति उप-सभापति को पद से हटाने का संकल्प विचार दिन हो तो वह पीठासीन से नहीं होगा यह अनुच्छेद 92 बताता है

  • अनुच्छेद 249 के अनुसारयदि  राज्य सभा उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित कर यह घोषित करती है कि राज्य सूची में उल्लिखित कोई विषय राष्ट्रीय महत्व का है तो संसद उस विषय पर अस्थायी कानून का निर्माण कर सकती है ऐसा प्रस्ताव 1 वर्ष से अधिक प्रभावी नहीं रहता है लेकिन यदि राज्यसभा चाहे तो हर बार इसे  1 वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है
  • केवल राज्य सभा को राज्य सभा में उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो तिहाई सदस्यों के बहुमत से अखिल भारतीय सेवाओं का सृजन करने का अधिकार है यह अनुच्छेद 312 में बताया गया है
  • धन विधेयक(अनुच्छेद 110) राज्यसभा में पुनः  स्थापित नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद 109(1 ))|
  • धन विधेयक के संबंध में राज्यसभा को केवल सिफारिश करने का अधिकार है जिसे मानने  के लिए लोकसभा बाध्य नहीं है इसके लिए राज्यसभा को 14 दिन का समय मिलता है यदि इस समय में विधेयक वापस नहीं होता है तो विधेयक पारित समझा जाता है राज्यसभा धन विधेयक को ना अस्वीकार कर सकती है और ना ही उसमें कोई संशोधन कर सकती है
  • राष्ट्रपति वर्ष में कम से कम 2 बार राज्यसभा का अधिवेशन आहूत(बुलाना) करता है राज्यसभा के एक सत्र की अंतिम बैठक तथा अगले सत्र  की प्रथम बैठक के लिए नियत तिथि के बीच 6 माह से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए
  • राज्यसभा का पहली बार गठन 3 अप्रैल 1952 ईस्वी को किया गया था इस की पहली बैठक 13 मई 1952 को हुई थी

ध्यान दें:-  राज्यसभा में प्रतिनिधित्व नहीं है अंडमान निकोबार चंडीगढ़ दादरा नगर हवेली दमन व दीव और लक्ष्यदीप का

भारतीय संसद के कार्य एवं शक्तियां

भारतीय संसद सम्प्रभु नहीं है, किन्तु यह बहुत ज्यादा  शक्तियों का प्रयोग करती है तथा महत्वपूर्ण कार्यों का सम्पादन करती है। इसकी शक्तियों का उल्लेख निम्नलिखित है 

(1) संविधान के संशोधन की शक्ति:- संविधान के संशोधन के सम्बन्ध में संसद को  शक्ति प्राप्त है। संविधान के अनुसार संविधान में संशोधन का प्रस्ताव संसद में ही प्रस्तावित किया जा सकता है लेकिन  किसी राज्य के विधानमण्डल में नही। संसद के दोनों सदनों(राज्य सभा  और लोक सभा ) द्वारा संविधान में संशोधन किया जाता है और संविधान के अधिकांश भाग में अकेली संसद के द्वारा ही या तो सामान्य बहुमत से या अलग- अलग  दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत से परिवर्तन किया जा सकता है। संविधान की केवल कुछ ही व्यवस्थाएं ऐसी हैं जिनमें संशोधन के लिए भारतीय संघ के आधे राज्यों के विधानमण्डलों की स्वीकृति आवश्यक होती है।

(2) विधायी शक्तियां:-संसद का सबसे प्रमुख कार्य राष्ट्रीय हितों को दृष्टि में रखते हुए कानूनों का निर्माण करना है। संसद को संघीय सूची के 97 और समवर्ती सूची के 47 विषयों पर कानून निर्माण का अधिकार प्राप्त है। यद्यपि समवर्ती सूची के विषयों पर संघीय संसद का और विधानमण्डल दोनों के द्वारा ही कानून का निर्माण किया जा सकता है किन्तु इन दोनों द्वारा निर्मित कानूनों में पारस्परिक विरोध होने की स्थिति में संसद द्वारा निर्मित कानून ही मान्य होंगे। संसद के द्वारा अवशेष विषयों पर भी कानून का निर्माण किया जा सकता है, क्योंकि संविधान के द्वारा अवशेष शक्तियां संघ को सौंपी गयी हैं। इसके अतिरिक्त सभी संघीय क्षेत्रों के लिए संसद को सदैव ही सभी विषयों पर कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है।

ध्यान दे :- संविधान के द्वारा संकटकाल के सम्बन्ध में विशेष व्यवस्था की गयी है। संकटकाल की घोषणा के समय संसद राज्यों के लिए राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है। इन सबके अतिरिक्त सामान्य काल में भी कुछ ऐसी परिस्थितियां हैं जबकि संसद के द्वारा राज्य सूची के विषयों पर भी कानून का निर्माण किया जा सकता है। प्रथम, जब कभी दो या अधिक राज्यों के विधानमण्डल प्रस्ताव पास करके संसद से राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाने की प्रार्थना करें तो संसद उन राज्यों के सम्बन्ध में ऐसा कर सकती है। द्वितीय, जब कभी राज्यसभा दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास करे कि राष्ट्रीय हित में संसद को राज्य-सूची के किसी विषय विशेष पर कानून बनाना चाहिए।

(3 ) प्रशासनिक शक्तियां:- भारतीय संविधान के द्वारा संसदात्मक व्यवस्था की स्थापना की गयी है, अतः संविधान के अनुसार संघीय कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिमण्डल संसद (व्यवहार में लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी होता है। मन्त्रिमण्डल केवल उसी समय तक अपने पद पर रहता है, जब तक कि उसे लोकसभा का विश्वास प्राप्त हो।

(4 ) निर्वाचन सम्बन्धी शक्तियां:- अनुच्छेद 54 के द्वारा संसद को कुछ निर्वाचन सम्बन्धी शक्तियां प्रदान की गयी हैं। संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए गठित निर्वाचक मण्डल के अंग हैं। अनुच्छेद 66 के अनुसार संसद सदस्य दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में उपराष्ट्रपति का निर्वाचन करते हैं।

  1. संसद के दोनों सदन संविधान द्वारा निर्धारित विशेष प्रक्रिया के आधार पर राष्ट्रपति के विरूद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पार कर उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को अक्षमता व दुराचरण के आधार पर पदच्युत करने का प्रस्ताव पास कर सकते हैं। इस प्रकार का प्रस्ताव प्रत्येक सदन में दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित होना चाहिए। उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए राज्यसभा द्वारा पारित प्रस्ताव लोकसभा द्वारा अनुमोदित होना चाहिए।
  2.  राष्ट्रपति द्वारा घोषित संकटकालीन घोषणा को निश्चित अवधि से अधिक समय तक लागू रखने के लिए संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति आवश्यक है।
  3.  अन्त में संसद सार्वजनिक विवाद स्थल का कार्य करती है। इस दृष्टि से संसद लोकप्रिय भावना के दर्पण तथा शिक्षक का कार्य करती है।
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