State Legislature | राज्य विधान मंडल | भारतीय संविधान

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राज्य विधान मंडल (The State Legislature)

  • राज्य की विधान मंडल (The State Legislature) संसद की तरह ही है जिस तरह केंद्र के लिए संसद (Parliament) की व्यवस्था की गई है उसी प्रकार राज्यों के लिए विधानमंडल की व्यवस्था की गई है लेकिन संसद में दो सदन होते हैं जब के राज्य की विधान मंडल में दो सदन हो भी सकता है और नहीं भी हो सकते इस लेख में हम राज्य की विधान मंडल पर सरल और सहज चर्चा करेंगे तथा इसके घटना कार्य विशेषाधिकार आदि को समझेंगे अगर आप को संसद की अच्छी जानकारी  है तो आप इसे आसानी से जान जाएंगे
  • जैसे कि हम संसद की बात करें तो वह भी एक विधानमंडल है क्योंकि वहां विधि बनाने का काम ही होता है इसलिए हम उसे केंद्रीय विधानमंडल कह सकते हैं इसी प्रकार से संविधान द्वारा प्रत्येक राज्य के लिए एक विधानमंडल की व्यवस्था की गई है जिससे राज्य विधानमंडल के नाम से जाना जाता है जिस प्रकार देश की राजनीतिक व्यवस्था में संसद की भूमिका होती है ठीक उसी प्रकार राज्य की राजनीति व्यवस्था में विधानमंडल की भूमिका होती है 
  • संविधान का भाग 6 अनुच्छेद 168 से 212 तक राज्य की विधान मंडल के गठन, कार्यकाल, अधिकारियों ,प्रक्रियाओं, विशेषअधिकार तथा शक्तियों आदि के बारे में बताया गया है अनुच्छेद 168 में कहा गया है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक विधानमंडल होगा

राज्य विधान मंडल का गठन

  • अगर हम संसद की बात करें तो वहां दो सदन होते हैं (राज्यसभा और लोकसभा) लेकिन राज्य के विधान मंडल के गठन की बात करें तो इसमें कोई समानता नहीं है क्योंकि किसी राज्य में एक सदन व्यवस्था है तो किसी में द्विसदनीय व्यवस्था है यानी कि किसी राज्य में विधानसभा और विधान परिषद दोनों होते हैं जबकि कुछ राज्यों में सिर्फ विधानसभा होती है
  • वर्तमान समय में 6 राज्यों में द्विसदनीय विधानमंडल है (उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा तेलंगाना) इसके अलावा राजस्थान और असम को भारत की संसद ने अपने स्वयं की विधानपरिषद बनाने की मंजूरी दे दी है शेष सभी राज्यों में एक सदस्य विधान मंडल है
  •  जिन राज्यों में एक सदनीय व्यवस्था है वहां राज्य विधानमंडल में राज्यपाल एवं विधानसभा शामिल होते हैं और जिन राज्यों में दो सदनीय व्यवस्था है वहां विधानमंडल में राज्यपाल विधानसभा और साथ में विधान परिषद भी शामिल होते हैं विधान परिषद को उच्च सदन कहा जाता है जबकि विधानसभा को निम्न सदन कहा जाता है

किसी राज्य में विधान परिषद होती है और किसी में विधान परिषद नहीं होती ऐसा क्यों होता है ?

  • संविधान बनाते समय बहुत से सदस्यों का यह मानना था कि विधान परिषद विधानमंडल के विधायी कार्य को विलंब करेगी और साथ ही यह राज्य का खर्चा भी बढ़ाएगी इसलिए इसे एक वैकल्पिक व्यवस्था बना दिया गया अर्थात यदि किसी राज्य को विधान परिषद की स्थापना या गठन करना है तो राज्य अपनी इच्छा व आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ऐसा कर सकता है उदाहरण के लिए आंध्र प्रदेश ने 1957 में विधान परिषद का गठन किया और फिर 1985 ईस्वी में इसे समाप्त कर दिया गया पुनः  2007 में आंध्र प्रदेश में विधान परिषद का गठन हुआ इसी प्रकार तमिलनाडु में विधान परिषद था तो उसने 1986 में उसे समाप्त कर दिया

संविधान ने संसद को यह अधिकार दिए हैं कि वह राज्य विधान परिषद का गठन एवं विघटन कर सकती है लेकिन वह कैसे करेगी वह पढ़ते हैं ?

  • यदि किसी राज्य को विधान परिषद चाहिए या अगर किसी राज्य में विधान परिषद पहले से है और वह उसे हटाना चाहता है तो उस राज्य के विधानसभा को इस संबंध में एक संकल्प पारित करना होगा इस तरह का कोई विशेष प्रस्ताव राज्य विधानसभा द्वारा पूर्ण बहुमत से पारित होना आवश्यक होता है अर्थात यह बहुमत कुल मतों एवं उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई से कम नहीं होना चाहिए
  • अगर इस तरह की कोईकार्यवाही होती है तो उसे संविधान संशोधन (अनुच्छेद 368) नहीं माना जाएगा यानी कि यह सब एक सामान्य विधान की तरह पारित किया जाता है

राज्य विधान मंडल की सदस्यता

1 सदस्यों की योग्यता (Qualification of members )

कोई व्यक्ति विधानमंडल का सदस्य तभी चुना जा सकता है जब वह संविधान द्वारा उल्लेखित निम्नलिखित योग्यताओं को पूरी करता हो

  1.  उसे भारत का नागरिक होना चाहिए
  2. उसे चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी पड़ती है जिसमें वह संकल्प पारित करता है कि वह भारत के संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा रखेगाऔर भारत की संप्रभुता एवं अखंडता को अक्षुण रखेगा
  3. उसकी आयु विधानसभा के लिए कम से कम 25 वर्ष होनी चाहिए और विधान परिषद के लिए कम से कम 30 वर्ष होनी चाहिए
  4. उसमें संसद द्वारा निर्धारित अन्य योग्यता भी होनी चाहिए जैसे कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत सदन ने निम्नलिखित अतिरिक्त योग्यताओं का निर्धारण किया है जैसे (1) विधान परिषद में निर्वाचित होने वाला व्यक्ति विधानसभा का निर्वाचन होने की योग्यता रखता हो और उसमें राज्यपाल द्वारा नामित होने के लिए संबंधित राज्य का निवासी होना चाहिए (2)अनुसूचित जाति एवं जनजाति का सदस्य होना चाहिए यदि वह अनुसूचित जाति जनजाति की सीट के लिए चुनाव लड़ता है हालांकि अनुसूचित जाति व जनजाति का सदस्य उस सीट के लिए भी चुनाव लड़ सकता है जो उसके लिए आरक्षित ना हो
अयोग्यता (Disqualification of members)

संविधान के अनुसार कोई व्यक्ति राज्य विधान परिषद या विधानसभा के लिए नहीं चुना जा सकता है

  1.  यदि वह केंद्र या राज्य सरकार के तहत किसी लाभ के पद पर है
  2.  यदि वह विकृत चित्र है और समझ न्यायालय की ऐसी घोषणा विद्यमान है
  3.  यदि वह घोषित दिवालिया हो
  4.  यदि वह भारत का नागरिक ना हो या उसने विदेश में कहीं नागरिकता शिक्षा से अर्जित कर ली हो या किसी विशेष राज्य के प्रति निष्ठा रखता हो 
  5.  यदि यदि संसद द्वारा निर्मित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन अयोग्यता करार दिया गया हो 

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत संसद ने कुछ अतिरिक्त योग्यता निर्धारित की हैं

  1.  वह चुनाव में किसी प्रकार के भ्रष्ट आचरण अथवा चुनावी अपराध का दोषी नहीं होना चाहिए
  2.  उसे किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया गया हो जिसके लिए उसे दो या दो से अधिक वर्षों के लिए सजा मिली हुई हो लेकिन किसी व्यक्ति का किसी निरोधात्मक कानून के अंतर्गत निरुद्ध  करना अयोग्यता नहीं माना जाएगी
  3.  वह निर्धारित समय सीमा के अंदर चुनावी खर्च संबंधित विवरण प्रस्तुत करने में विफल नहीं रहा हो
  4.  उसका किसी सरकारी ठेके, कार्य अथवा सेवाओं में कोई रुचि नहीं हो
  5.  वह किसी ऐसे निगम में लाभ का पद पर कार्यरत नहीं हो अथवा उसका निदेशक या प्रबंधकीय एजेंट नहीं हो जिसमें सरकार की कम से कम 25 हिस्सेदारी हो
  6.  वह भ्रष्टाचार अथवा सरकार के प्रति विश्वासघात के कारण सरकारी सेवा से हटाया गया हो
  7.  उसे विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने अथवा घूसखोरी के अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया हूं आठवां उसे अश्लीलता दहेज प्रथा सती प्रथा आज जैसे सामाजिक अपराधों में शामिल अथवा बढ़ावा देने के लिए दंडित नहीं किया गया हो
विधान मंडल के सदस्यों की शपथ
  • विधानमंडल के प्रत्येक सदन का प्रत्येक सदस्य सदन में सीट ग्रहण करने से पहले राज्यपाल या उसके द्वारा नियुक्त किए गए व्यक्ति के सामने शपथ लेगा इस शपथ में विधानमंडल का सदस्य प्रतिज्ञा करता है कि वह पहला भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेगा दूसरा भारत की प्रभुता व अखंडता को अक्षुण्ण रखेगा तीसरा प्रदत कर्तव्यों का श्रद्धा पूर्वक निर्वहन करेगा
  • बिना शपथ लिए कोई भी सदस्य सदन में न तो मत दे सकता है और ना ही कार्यवाही में भाग ले सकता है अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो उस पर प्रतिदिन ₹5000 का जुर्माना लिया जाएगा
राज्य के विधान मंडल के सदस्यों के स्थानों का रिक्त होना

विधानमंडल का सदस्य अपने पद को छोड़ता है या उसे छोड़ना पड़ता है तो कैसे छोड़ता है वह चलो जानते हैं?

  1. दोहरी सदस्यता:- एक व्यक्ति एक समय में विधानमंडल के दोनों सदनों का सदस्य नहीं हो सकता है यदि कोई व्यक्ति दोनों सदनों के लिए निर्वाचित होता है तो राज्य विधान मंडल द्वारा निर्मित विधि के उप वनों के तहत एक सदन से उसकी सीट रिक्त हो जाएगी
  2.  अयोग्यता (निरर्हता ):- राज्य की विधान मंडल का कोई सदस्य यदि अयोग्य यानी अनपढ़ पाया जाता है तो उसे अपने पद से इस्तीफा देना होगा  
  3. त्याग पत्र :- विधानमंडल का कोई सदस्य अपना लिखित इस्तीफा विधान परिषद के मामले में सभापति को देगा और विधानसभा के मामले में अध्यक्ष को देगा त्यागपत्र स्वीकार होने पर उसका पद रिक्त माना जाएगा
  4. अनुपस्थिति एब्सेंट:- यदि कोई सदस्य बिना सूचना के 60 दिनों तक बैठक में अनुपस्थित रहता है तो सदन उसके पद को खाली यानी रिक्त घोषित कर सकता है
  5. अन्य मामले :-  किसी सदस्य का पद रिक्त हो सकता है (1) यदि न्यायालय द्वारा उसके निर्वाचन को अमान्य ठहराया गया हो (2) यदि उसे सदन से निष्कासित कर दिया गया हो (3)  यदि वह राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हो जाए (4)  यदि वह किसी राज्य का राज्यपाल निर्वाचित हो जाए
विधानमंडल के पीठासीन अधिकारी:
  • विधानमंडल के प्रत्येक सदन का एक अपना पीठासीन अधिकारी होता है विधानसभा के लिए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष एवं विधान परिषद के लिए सभापति और उपसभापति होते हैं विधानसभा के लिए सभापति का पैनल एवं विधान परिषद के लिए उपाध्यक्ष का पैनल भी नियुक्त किया जाता है
  • कोरम गणपूर्ति:-  किसी भी कार्य को करने के लिए उपस्थित सदस्यों की न्यूनतम संख्या को कोरम कहते हैं यह सदन में कुल सदस्यों का दसवां हिस्सा होता है यदि सदन की बैठक के दौरान कोरम ना हो तो यह पीठासीन अधिकारी का कर्तव्य है कि सदन को स्थगित करें या कोरम पूरा होने तक सदन को स्थगित रखें
  • सदन में मतदान की प्रक्रिया:- किसी भी सदन की बैठक में सभी मामलों को उपस्थित सदस्यों के बहुमत के आधार पर तय किया जाता है और इसमें पीठासीन अधिकारी का मत सम्मिलित नहीं होता है कुछ मामले जिन्हें विशेष रूप से संविधान में तय किया गया है जैसे कि विधानसभा के अध्यक्ष को हटाना या विधान परिषद के सभापति को हटाना इनमें सामान्य बहुमत की बजाय विशेष बहुमत की जरूरत होती है पीठासीन अधिकारी सामान्य स्थिति में मत नहीं दे सकता है लेकिन बराबर मत आने पर निर्णायक मत दे सकता है
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