The Co-Operative Societies || सहकारी समितियाँ

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सहकारी समितियाँ क्या है ?

सहकारी शब्द का शाब्दिक अर्थ है साथ मिलकर कार्य करना अर्थात ऐसे व्यक्ति जो समान रूप से आर्थिक उद्देश्य के लिए साथ मिलकर काम करते हैं वह सहकारी समिति बना सकते हैं इसे ही सहकारी समिति कहते हैं।

सहकारी समितियों को सहकारी संस्था, सार्वजनिक निगम एवं सहकारी उपक्रम आदि के नामों से जाना जाता है सहकारी समिति ऐसे लोगों का संघ होता है जो अपने पारस्परिक लाभ के लिए स्वेच्छा पूर्ण सहयोग करते हैं।औद्योगिक क्रांति के कारण उत्पन्न आर्थिक व सामाजिक तंगी के परिणाम स्वरुप भारत में वर्ष 1960 में एडवर्ड लॉ की अध्यक्षता में सहकारी समिति के संगठनों की व्यवस्था एक प्रस्ताव के आधार पर की गई प्रस्ताव के आधार पर 1904 में सहकारी साख अधिनियम पास किया गया, कई पूंजीवादी देशों जैसे संयुक्त राष्ट्र अमेरिका तथा जापान आदि देशों में सहकारी समितियों ने देश में उन्नति लाई है।

सहकारी समितियों का गठन

सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा 97 वे संविधान संशोधन अधिनियम 2011 द्वारा प्रदान किया गया इस संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में भाग 9 B जोड़ा गया इस भाग के अनुच्छेद (243 ZH  से 243 ZT)  तक सहकारी समितियों के बारे में प्रावधान है और इसका अध्यक्ष गृहमंत्री होता है 

अनुच्छेद 243 ZH  के तहत प्राधिकृत व्यक्ति बोर्ड सहकारी समिति बहुराज्य सहकारी समिति पद धारक, रजिस्ट्रार, राज्य अधिनियम, तथा राज्य स्तरीय सहकारी समिति को परिभाषित करता है

अनुच्छेद 243 Z J के अनुसार सहकारी समिति में निदेशकों की अधिकतम संख्या 21 हो सकती है जिसमें से एक स्थान अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए तथा दो स्थान महिला सदस्यों के लिए आरक्षित होता है निदेशक बोर्ड में उपरोक्त 21 सदस्यों के अतिरिक्त 2 सदस्यों को सहा योजित सदस्य के रूप में शामिल किया जा सकता है परंतु ऐसे सदस्यों को सहकारी समिति के किसी निर्वाचन में मतदान करने या बोर्ड के किसी पदाधिकारी के रूप में चुने जाने का अधिकार नहीं होता है सहकारी समिति का कार्यकारी निदेशक भी बोर्ड का सदस्य होता है और उसकी घटना निदेशक बोर्ड की अधिकतम संख्या 21 में नहीं की जाती है

सहकारी समिति के सदस्यों की पदावली या कार्यकाल 

बोर्ड के निर्वाचित सदस्यों की पदावली उनके निर्वाचन की तिथि से 5 वर्ष की होती है अनुच्छेद 243 ZK  अनुसार बोर्ड का निर्वाचन बोर्ड की अवधि के समापन के पूर्व होता है बोर्ड के दमन के मामले में बोर्ड का निर्वाचन दमन की तिथि से 6 माह के भीतर कराया जाता है सहकारी समिति के किसी बोर्ड को 6 माह से अधिक अवधि के लिए दमन या निलंबन के अधीन नहीं रखा जाएगा परंतु निम्न दशाओं में उसका 6 माह से अधिक अवधि के लिए दमन या निलंबन किया जा सकेगा

भारत में सहकारी आंदोलन

भारत में सहकारी आंदोलन की शुरुआत 1904 ईस्वी में सहकारी साख समिति अधिनियम से हुई थी भारत में सहकारी आंदोलन के जनक A.F निकोलसन को माना जाता है 1904 ईस्वी के सहकारी अधिनियम में Non-Credit Societies के निर्माण का प्रावधान किया गया तथा  इसका मुख्य उद्देश्य समिति के सदस्यों का आर्थिक स्तर उन्नत बनाना और दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना था 1912 के सहकारी अधिनियम में केंद्रीय सहकारी समिति के निर्माण हेतु भी प्रावधान किया गया था

1914 ईस्वी में सरकार ने सर मेकलागन के नेतृत्व में एक कमेटी गठित की कमेटी ने पाया के लोगों में यह भावना व्याप्त कर गई है कि सहकारी संस्था मुख्यतः सरकारी एजेंसी है इसीलिए इस आलोक में कमेटी द्वारा निम्नलिखित सुझाव दिए गए

  1. सहकारिता का सिद्धांत की उचित शिक्षा दी जाए
  2.  प्राथमिक सहकारी समितियों की सहायता हेतु सहकारी बैंक का निर्माण होना चाहिए
  3.  प्रत्येक राज्य में प्रादेशिक सहकारी समिति होनी चाहिए
  4.  ऋण देने से पहले सदस्यों की सावधानीपूर्वक जांच हो  सहकारी आंदोलनों के अध्ययन एवं इसके सफलता के लिए सुझाव देने हेतु सरकार के द्वारा प्रोफेसर डीआर गाडगिल के नेतृत्व में 1944 ईस्वी में कृषि उप कमेटी गठित की गई

1945 में सरकार ने एक अन्य सहकारी योजना कमेटी का गठन किया यह कमेटी अपना प्रतिवेदन 1946 में सरकार को सौंप दी 1951 ईस्वी में अखिल भारतीय ग्रामीण सर्वेक्षण कमेटी का प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ कमेटी के अध्यक्ष एडी गोरवाला थे ऐसे कमेटी के द्वारा निम्न सुझाव दिए गए पहला  सहकारी समितियों का संगठन

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