The Indian Judiciary ||भारतीय न्यायपालिका || सर्वोच्च न्यायालय || Supreme Court

Table of Contents

भारतीय न्यायपालिका क्या है 

  भारतीय शासन प्रणाली का तीसरा आधार स्तंभ और न्यायपालिका है भारत की शासन प्रणाली संघीय है लेकिन न्यायपालिका एकीकृत है यानी इसका तात्पर्य है कि पूरे देश के लिए एक ही सर्वोच्च न्यायालय है और केंद्र और राज्यों के लिए अलग-अलग न्यायालय नहीं है और ना ही विभिन्न न्यायालयों के मध्य शक्तियों का विभाजन है भारतीय न्यायालयों का संगठन शंकु की आकृति का है जिसमें शिखर पर उच्चतम न्यायालय सुप्रीम कोर्ट है उसके नीचे उच्च न्यायालय हाई कोर्ट तथा उच्च न्यायालय के नीचे अधीनस्थ न्यायालय जिला न्यायालय डिस्ट्रिक्ट कोर्ट विभिन्न जिलों में स्थापित किए गए हैं जिला न्यायालय का प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश डिस्टिक एंड सेशन जज होता है वह जिले का सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी होता है जब वह सिविल मामलों की सुनवाई करता है तो जिला न्यायाधीश और जब आपराधिक मामले की सुनवाई करता है तो सत्र न्यायाधीश कहलाता है 

जिले में जिला एवं सत्र न्यायाधीश के नीचे सिविल और आपराधिक मामलों को देखने के लिए अलग-अलग मजिस्ट्रेट होते हैं सिविल मामलों को देखने वाले मजिस्ट्रेट को मुंसिफ मजिस्ट्रेट या सिविल जज तथा आपराधिक मामलों को देखने वाले मजिस्ट्रेट को न्यायिक मजिस्ट्रेट जुडिशरी मजिस्ट्रेट कहा जाता है न्यायिक मजिस्ट्रेट का प्रमुख मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट चीफ ज्यूडिशल मजिस्ट्रेट सीजेएम होता है

कुछ राज्यों में पंचायत न्यायालय का भी गठन किया गया है यह न्यायालय अलग-अलग नामों से जानी जाती है जैसे न्याय पंचायत पंचायत अदालत ग्राम कचहरी आदि के नाम से विभिन्न राज्यों में कार्य कर रहे हैं उत्तर प्रदेश भारत का एक ऐसा पहला राज्य है जिसमें पंचायत राज्य अधिवेशन 1947 के तहत न्याय पंचायत का गठन किया गया था इसमें कुल 5 सदस्य होते हैं जो जिलाधिकारी डीएम द्वारा जिला न्यायाधीश के साथ विचार विमर्श कर ग्राम सभा सदस्यों में से नामित किए जाते हैं अथवा पंचायत समिति द्वारा निर्वाचित होते हैं न्याय पंचायत आपराधिक तथा सिविल दीवानी के छोटे मामलों की सुनवाई करती है जिले के प्रत्येक प्रखंड मैं एक न्याय पंचायत स्थापित की जाती है इन सबके अतिरिक्त देश में विभिन्न अधिक करण तथा आयोग भी स्थापित किए गए हैं जो पारंपरिक न्यायालय तो नहीं है किंतु विधिक प्रक्रिया के अनुसार विवादों को निपटाने का ही कार्य करते हैं

सर्वोच्च न्यायालय उच्चतम न्यायालय सुप्रीम कोर्ट

भारतीय संविधान का भाग 5 के अंतर्गत अनुच्छेद 124 से 147 तक सर्वोच्च न्यायालय के संबंध में बताया गया है सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना एवं गठन संबंधी प्रावधान अनुच्छेद 124 में दिया गया है अनुच्छेद 126 के तहत कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश तथा अनुच्छेद 127 के तहत तदर्थ न्यायाधीश की नियुक्ति की जा सकती है अनुच्छेद 129 उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड घोषित करता है उच्चतम न्यायालय का स्थान सीट ऑफ सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 130 के तहत तथा उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता अनुच्छेद 131 के तहत दी गई है अनुच्छेद 136 अपील के लिए उच्चतम न्यायालय की विशेष इजाजत स्पेशल लीव ऑफ एपीएल तथा अनुच्छेद 137 उच्चतम न्यायालय की पुनरावलोकन रिव्यू की शक्ति के बारे में है अनुच्छेद 141 के अनुसार उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि सभी न्यायालयों पर आबद्धकर होती है राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श लेने का अधिकार है यह अनुच्छेद 143 बताता है अनुच्छेद 145 के तहत उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय की पद्धति एवं प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए नियम रूल बनाने का अधिकार दिया गया है अनुच्छेद 146 के तहत उच्चतम न्यायालय के अधिकारियों तथा सेवकों की नियुक्ति संबंधी प्रावधान दिया गया है

सर्वोच्च न्यायालय का गठन

सर्वोच्च न्यायालय के गठन के बारे में प्रावधान अनुच्छेद 124 एक में दिया गया है अनुच्छेद 124 ए के तहत मूल संविधान में सर्वोच्च न्यायालय के लिए एक मुख्य न्यायाधीश तथा सात अन्य न्यायाधीश की व्यवस्था की गई थी और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की संख्या सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार न्यायाधीशों के वेतन यस सेवा शर्तों निश्चित करने का अधिकार संसद को दिया गया था इस शक्ति का प्रयोग कर संसद ने 1956 ईस्वी में सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीशों की संख्या अधिनियम 1956 पारित किया और उनकी संख्या 7 से बढ़ाकर 10 मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर कर दिया बाद में समय-समय पर इस अधिनियम में संशोधन होते रहे और न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि होती रही जैसे 1960 में 13 1978 में 17 तथा 1986 में 25 न्यायाधीश मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर नियत किए गए वर्ष 2008 में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि कर उसे 25 से 30 कर दिया गया जिसमें मुख्य न्यायाधीश शामिल नहीं है अभी हाल ही में उच्चतम न्यायालय ( न्यायाधीशों की संख्या) विधेयक 2019 को लोकसभा में 5 अगस्त को और राज्यसभा ने 7 अगस्त को 2019 को पारित कर दिया अतः 9 अगस्त को राष्ट्रपति ने इस विधेयक पर हस्ताक्षर भी कर दिए इस अधिनियम के द्वारा उच्च न्यायालयों की संख्या 30 के स्थान पर 33 कर दिया गया जो मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त होगी अतः वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 है जिसमें मुख्य न्यायाधीश भी शामिल है

सर्वोच्च न्यायालय का स्थान

सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में स्थितntmentयाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में प्रावधान अनुच्छेद 124 में दिया गया है इसमें कहा है कि राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के और उच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के बाद जिन से परामर्श करना वह जरुरी समझे उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को नियुक्त करेगा अतः संविधान के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं है प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए एक ही प्रक्रिया दी गई है

संविधान के लागू होने पर प्रक्रिया से हटकर उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ एवं न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किए जाने की प्रथा विकसित हुई जो 1973 ईस्वी तक निर्बाध रूप में चलती रही शिवाय न्यायमूर्ति जफर इनाम को छोड़कर जो लकवे के शिकार हो गए थे इसलिए उनके स्थान पर पीवी गजेंद्रगड़कर को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था 1973 में  केसवानंद भारतीय के मामले में निर्णय दिए जाने ही कुछ घंटों के बाद ही अप्रत्याशित रूप से तीन न्यायाधीशों न्यायमूर्ति (J.S शेलट , K.S हेगडे तथा A.N ग्रोवर) की वरिष्ठता का उल्लंघन कर न्यायमूर्ति अजीत नाथ रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एम एम सीकरी की अध्यक्षता वाली 13 न्यायाधीशों की अब तक की सबसे बड़ी संविधान पीठ ने इस मामले में सरकार के विरुद्ध निर्णय लिया था तीनों वरिष्ठ न्यायाधीशों ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया सरकार ने अपने इस कदम के लिए विधि आयोग की 1956 की रिपोर्ट का तर्क दिया जिसमें कहा था मुख्य मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं वरन न्यायाधीशों के गुणों और उपयुक्ता  के आधार पर की जानी चाहिए इस अपराध को दोहराते हुए 1977 ईस्वी में न्यायमूर्ति A.R खन्ना की वरिष्ठता का उल्लंघन कर न्यायमूर्ति M.H वेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया दो मामलों को छोड़कर मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में सदैव वरिष्ठता के सिद्धांत को अपनाया गया 1993 में उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से यह निर्णय दिया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश का ही नियुक्ति की जाएगी सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ 1993

अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment of Others Judges)

उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर करता है राष्ट्रपति अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श भी ले सकता है जिनसे व परामर्श करना जरूरी समझे अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करना अनिवार्य है किंतु मुख्य न्यायाधीश के परामर्श को लेकर बाद में दो तरह के प्रश्न उत्पन्न हुए

(1)  राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश के परामर्श को मानने के लिए बाध्य है एस.पी गुप्ता बनाम भारत संघ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश का परामर्श मानने के लिए बाध्य नहीं है परंतु सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड बनाम भारत संघ 1993 (9 न्यायाधीशों की पीठ) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने उक्त निर्णय को पलटते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालयों में किसी न्यायाधीश की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय से की जा सकती है अन्यथा नहीं मुख्य न्यायाधीश दो वरिष्ठ न्यायाधीशों से परामर्श कर अपनी राय देगा

(2)  क्या राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश द्वारा अन्य न्यायाधीशों से परामर्श किए बिना भेजी गई सिफारिश को मानने के लिए वाद्य है अनुच्छेद 143 के अधीन इस प्रश्न पर राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय से सलाह मांगी गई 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ में अपनी सलाह में कहा कि  परामर्श प्रक्रिया का पालन किए बिना दी गई सिफारिश मांगने के लिए राष्ट्रपति बाध्य नहीं होगा न्यायालय ने परामर्श प्रक्रिया को और विस्तृत करते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ तम न्यायाधीशों के समूह से परामर्श करके ही अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेजनी चाहिए 1993 की निर्णय में सिर्फ दो वरिष्ठ न्यायाधीशों से परामर्श आवश्यक था वरिष्ठतम  न्यायाधीश अपना परामर्श लिखित रूप में  मुख्य न्यायाधीश को देंगे

संविधान पीठ ने यह भी कहा है कि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में उच्चतम न्यायालय के केवल दो वरिष्ठ न्यायाधीशों की सलाह लेना आवश्यक है किंतु स्थानांतरण के मामले में उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ एवं न्यायाधीशों के अतिरिक्त जिन उच्च न्यायालय के न्यायाधीश स्थानांतरित एवं पदारूढ़  होंगे और उनके मुख्य न्यायाधीशों से परामर्श करना होगा

कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति (Appointment of Acting Chief Justice)

अनुच्छेद 126 के तहत उच्चतम न्यायालय मैं कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का प्रावधान है जब मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो या मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थित या किसी कारण से अपने कर्तव्य के पालन में असमर्थ हो तो अन्य न्यायाधीशों में से किसी न्यायाधीश को राष्ट्रपति कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है राष्ट्रपति को इस संबंध में किसी से परामर्श की आवश्यकता नहीं होती

पदार्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति(Appointment Of Ad-Hoc Justice)

उच्चतम न्यायालय में तदर्थ  न्यायाधीशों की नियुक्ति अनुच्छेद 127 के अधीन की जाती है तदर्थ न्यायाधीश की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश द्वारा राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से की जाती है किसी उच्च न्यायालय की ऐसे न्यायाधीश को जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किए जाने की योग्यता रखता हो संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है तदर्थ न्यायाधीश की नियुक्ति तब की जाती है जब के उच्चतम न्यायालय के सत्र को आयोजित करने या चालू रखने के लिए गणपूर्ति न होने पर न्यायाधीशों की आवश्यकता होती है सर्वोच्च न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीशओ की नियुक्ति संबंधी प्रावधान फ्रांस के संविधान से लिया गया है तदर्थ न्यायाधीश केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही नियुक्त किए जाते हैं उच्च न्यायालय में नहीं

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पदावली य कार्यकाल(Term Of Office Of Justice)

उच्चतम न्यायालय की सभी न्यायाधीश (मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीश) 65 वर्ष की आयु तक अपना पद धारण करते हैं न्यायाधीशों की आयु ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसी रीति से आधारित की जाएगी जो संसद विधि द्वारा उपबंधित करें यह अनुच्छेद 124 (2क) में बताया गया है किंतु कोई न्यायाधीश राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा कभी भी अपना त्यागपत्र दे सकता है किसी न्यायाधीश को अनुच्छेद 124 (4) के तहत उसके पद से हटाया भी जा सकता है

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाया जाना

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया अनुच्छेद 124(4) में दी गई है उन्हें केवल दो आधार पर पद से हटाया जा सकता है (1 )सिद्ध कदाचार (2 )असमर्थता के आधार पर उनके पद से हटाया जा सकता है किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटाने के लिए प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है प्रस्ताव प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत विशेष बहुमत से पारित होना चाहिए इस प्रक्रिया के दौरान आरोपित न्यायाधीश को अपने पक्ष में समर्थन और पैरवी करने का अधिकार होता है संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित प्रस्ताव राष्ट्रपति के समक्ष आदेश के लिए रखा जाता है राष्ट्रपति का आदेश मिल जाने पर ऐसे न्यायाधीश को उसके पद से हटा दिया जाता है तथा किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित प्रस्ताव उसी सत्र में राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए यह अनुच्छेद 124 (4) बताता है

ऐसे किसी प्रस्ताव को संसद में रखने तथा न्यायधीश के कदाचार या असमर्थता की जांच करने के लिए प्रक्रिया विहित करने की शक्ति संसद को दी गई है अनुच्छेद 124 (5) संसद में इस शक्ति के प्रयोग में न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 बनाया है जिसके अनुसार किसी न्यायाधीश को हटाने के लिए एक प्रस्ताव राष्ट्रपति को संबोधित कर लाया जाता है प्रस्ताव यदि लोकसभा में लाया जाता है तो कम से कम 100 सदस्यों द्वारा तथा यदि राज्यसभा में लाया जाता है तो कम से कम 50 सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर होने चाहिए यथास्थिति अध्यक्ष या सभापति प्रस्ताव को ग्रहण करने या न करने का निर्णय करता है प्रस्ताव ग्रहण किए जाने पर एक 3 सदस्य समिति जिसमें (एक उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश एक किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश तथा एक प्रसिद्ध न्यायविद होते हैं) आरोप की जांच के लिए गठित की जाती है यदि समिति अपनी रिपोर्ट में आरोप की पुष्टि करती है तो ऐसी रिपोर्ट और न्यायाधीश को हटाए जाने का प्रस्ताव उस सदन में रखा जाता है जिसमें कार्यवाही लंबित है एक सदन द्वारा प्रस्ताव पारित कर दिए जाने पर दूसरे सदन को भेजा जाता है दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित प्रस्ताव राष्ट्रपति के समक्ष आदेश के लिए रखा जाता है और तब राष्ट्रपति आरोपित न्यायाधीश को हटाने का आदेश देता है

ध्यान दे :-  अभी तक उच्चतम न्यायालय के एक भी न्यायाधीश को और उसके पद से हटाया नहीं गया है

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की शपथ(Oath or Affirmation)

अनुच्छेद 124(6) के अनुसार ऐसा व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया है राष्ट्रपति के समक्ष है या उसके द्वारा निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष अपना पद ग्रहण करने के पूर्व शपथ या प्रतिज्ञान करेगा शपथ का प्रारूप अनुसूचित 3 में दिया गया है उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश तथा भारत के नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक दोनों के लिए अनुसूचित 3 में शपथ का एक ही प्रारूप दिया गया है

न्यायाधीशों की वेतन एवं भत्ते

अनुच्छेद 125 के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को ऐसे वेतन दिए जाएंगे जो संसद विधि द्वारा निर्धारित करें संसद द्वारा पारित उच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीश वेतन एवं सेवा शर्तें संशोधन अधिनियम 2009 के अनुसार उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ₹100000 तथा अन्य न्यायाधीशों को ₹90000 दिए जाएंगे किंतु हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट संशोधन कानून 2018 के द्वारा वेतन में वृद्धि की गई इसके अनुसार उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का वेतन ₹280000 तथा अन्य न्यायाधीश का वेतन ₹250000 प्रति माह हो गया इसे 1 जनवरी 2016 से प्रभावी माना जाएगा उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन भत्ते एवं पेंशन भारत की संचित निधि से दिए जाते हैं

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति के बाद उसके वेतन भत्तों में कोई और अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता परंतु जब अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपात लागू हो तो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन भत्ते को कम करने के लिए राष्ट्रपति निर्देश दे सकता है उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए पेंशन एवं सेवानिवृत्ति वेतन की व्यवस्था सर्वप्रथम 1976 ईस्वी में की गई थी

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों पर प्रतिबंध
  • कोई व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका है भारत तो मैं किसी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष वकालत या कार्य नहीं कर सकता है यह अनुच्छेद 124(7) में बताया गया है
  • सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार एवं शक्तियां
  • भारतीय संविधान द्वारा उच्चतम न्यायालय को प्रारंभिक अपीलीय और परामर्श संबंधी व्यापक क्षेत्र अधिकार प्रदान किया गया है जहां वह संविधान की आधिकारिक व्याख्या करता है वही नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा भी करता है यह अनुच्छेद 131 बताता है
  • उच्चतम न्यायालय को प्रारंभिक अधिकारिता प्रदान करता है जिसके तहत उसे कुछ मामलों की सुनवाई का एब्सलूट अधिकार प्राप्त है वह भारत का सबसे बड़ा अपीलीय न्यायालय है अनुच्छेद 132 के तहत संवैधानिक मामलों में अनुच्छेद 133 के तहत सिविल मामलों में तथा अनुच्छेद 134 के तहत आपराधिक मामलों में अपीलीय अधिकार का प्राप्त है अनुच्छेद 136 उच्चतम न्यायालय को वैवेकीय अधिकार प्रदान करता है जिसके तहत वह किसी मामले में अपील के लिए विशेष इजाजत दे सकता है अनुच्छेद 137 के तहत वह अपने द्वारा दिए गए किसी निर्णय का पुनरावलोकन कर सकता है वह कुछ मामलों को अपने पास सुनवाई के लिए मंगा भी सकता है अनुच्छेद 143 के तहत उच्चतम न्यायालय को सलाहकारी अधिकारिता प्रदान किया गया है 

 

 

error: Content is protected !!